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सोनिया का डेढ़ दशक : नाक तक पहुँचा ‘नासूर’

अहमदाबाद। सीताराम केसरी विदा हुए और फिर एक बार गांधी की विरासत कांग्रेस के साथ जुड़ गई। सोनिया गांधी के रूप में कांग्रेस को सात वर्षों के बाद फिर एक बार गांधी की विरासत नसीब हुई। संशय ज्यादा थे, तो उम्मीदें भी। मेहनत रंग लाई और छह साल बाद दिल्ली के सिंहासन पर कांग्रेस का कब्जा हो गया। भले ही प्रधानमंत्री न बन सकीं सोनिया गांधी। कई राज्यों में भी पार्टी का जाल फैला, लेकिन जहां तक गुजरात का सवाल है, तो यह राज्य कांग्रेस के लिए जहाँ 1989 से नासूर बना रहा है, वहीं सोनिया के अध्यक्ष बनने के बाद तो यह नासूर कांग्रेस के दर्द में वृद्धि ही करता रहा है।

रामबाण होगा राहुल रूपी मरहम?
कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी ने गुरुवार को 15 साल पूरे कर लिए और गुजरात का चुनावी मैदान उनके लिए हमेशा नासूर बना रहा। इतना ही नहीं, अब यह नासूर नरेन्द्र मोदी के रूप में सोनिया गांधी की नाक तक पहुँच गया है। इस नासूर को दबाने के लिए राहुल गांधी रूपी मरहम तैयार किया गया है। राहुल को कांग्रेस उपाध्यक्ष बना कर सोनिया ने जहाँ एक ओर पार्टी के अगले अध्यक्ष की ओर इशारा कर दिया है, वहीं यह भी साफ है कि यदि 2014 में देश में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी, तो प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही बनेंगे, परंतु जिस प्रकार नरेन्द्र मोदी रूपी नासूर गुजरात से निकल कर अब दिल्ली तक पहुँच कर नाक में दम कर रहा है और जिस प्रकार नरेन्द्र मोदी की देश में लोकप्रियता का ग्राफ है, उसे देखते हुए सवाल यही खड़ा होता है कि क्या राहुल रूपी मरहम नरेन्द्र मोदी रूपी नासूर का रामबाण इलाज साबित होगा?

गांधी की जन्मभूमि पर ही पस्त
सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में 14 मार्च, 1998 को कार्यभार संभाला। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सोनिया का डेढ़ दशक का कार्यकाल दिल्ली से लेकर कई राज्यों तक उतार-चढ़ा भरा रहा। कहीं खुशी, तो कहीं गम का मिश्रण रहा, लेकिन गुजरात ने सोनिया के चेहरे पर मुस्कान कम, गम ज्यादा बिखेरा। गांधी की विरासत को संजोए कांग्रेस पार्टी महात्मा गांधी की जन्मभूमि पर ही नाकामियों की इबारतें तैयार करती गई।

करिश्मे पर भारी स्थानीय नाकामियाँ
स्थानीय कांग्रेस की नाकामी सोनिया के करिश्मे पर हमेशा भारी रही। सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद गुजरात में लोकसभा के 3 और विधानसभा के 3 चुनाव हुए, लेकिन किसी भी चुनाव में कांग्रेस कभी भी भाजपा पर भारी साबित न हो सकी। 1998 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति के बाद सोनिया ने उसी साल 14 मार्च को कांग्रेस अध्यक्ष पद संभाला। सोनिया के कार्यभार संभालने के बाद 1999 में लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला, वहीं गुजरात में 26 में से महज 6 सीटें मिलीं। भाजपा को 20 सीटें हासिल हुईं। इसके बाद 2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव हुए। यहां भी कांग्रेस को बुरी तरह शिकस्त मिली और भाजपा को दो तिहाई बहुमत हासिल हुआ। ऐसा नहीं कि सोनिया ने गुजरात के लिए मेहनत नहीं की। तूफानी दौरे किए, सभाएं कीं, जनता के बीच गईं, दांडी यात्रा तक की, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात रहा।

राहत, फिर आफत
हालांकि 2002 में विधानसभा चुनावी हार के बाद भी सोनिया ने गुजरात के लिए मेहनत जारी रखी। जितने प्रयास सोनिया ने किए, शायद स्थानीय नेताओं के जज्बे में उतना जोश नहीं रहा। इसके बावजूद 2004 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति बेहतर हुई। इस बार पार्टी ने 26 में से 12 सीटों पर कब्जा किया। फिर भी वह भाजपा से उन्नीस ही रही। यहां शायद कुछ राहत मिली। स्थानीय नेताओं ने सोच लिया अब विधानसभा चुनाव 2007 में भी फतह निश्चित है, लेकिन शायद वे नहीं जानते थे कि सोनिया के करिश्मे से ज्यादा कुछ कर गुजरने की जरूरत है। सोनिया ने अपनी तरफ से पूरी मेहनत की। दर्जन भर सभाएं कीं। राहुल गांधी ने रोड शो किए। स्थानीय नेता राष्ट्रीय नेताओं के पिछलग्गू साबित हुए और आखिरकार गुजरात का नासूर फिर नासूर ही बना रहा। जीत चाहे मोदी की हुई हो या भाजपा की, लेकिन हार का दर्द तो आखिरकार सोनिया को ही हुआ। इतनी नाकामियों के बावजूद सोनिया गांधी गुजरात के लिए सब कुछ करती रहीं। 2009 में भी उन्होंने खूब मेहनत की और फिर एक बार कांग्रेस के लिए परिणाम राहतजनक रहे। हालांकि इस बार एक सीट घट कर 11 रह गई, परंतु 2007 के मुकाबले हालात सुधरे थे, लेकिन 2012 के विधानसभा चुनाव में फिर वही इतिहास दोहराया गया। सोनिया-राहुल की सभाओं और करिश्मों पर स्थानीय कांग्रेस की नाकामी हावी रही और पार्टी को फिर एक बार गांधीनगर की सत्ता से दूर रहना पड़ा।

यह हार गले का हार या फंदा?
आफत और राहत का सिलसिला तो लगातार चलता आ रहा है, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव 2012 में जो कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा, वह हार कोई सामान्य हार नहीं है। यह हार कांग्रेस के गले में पड़ी हार नहीं, बल्कि फंदा है। सब जानते थे कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता देश में धीरे-धीरे लगातार बढ़ती जा रही है और गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 में उनकी लगातार तीसरी जीत को उनके दिल्ली रुख के रूप में देखा जा रहा था। यहाँ सोनिया और राहुल दोनों ने गलती कर दी। गुजरात में ही मोदी को रोक लिया जाता, तो शायद आज सोनिया गांधी अपने अध्यक्षीय कार्यकाल की 15वीं वर्षगांठ निश्चिंत होकर मना रही होतीं, लेकिन गुजरात में मोदी के बढ़ते कदम को रोक पाने में विफलता ने सोनिया के लिए गुजरात से मिले नासूर को नाक तक बढ़ने की खुली छूट दे दी। अब देखना यही होगा कि यह नासूर नाक में दम करता है या फिर कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी अगली वर्षगांठ पर सोनिया गांधी इस नासूर से मुक्ति के साथ राहत की साँस लेती हैं।

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