अखिलेश अकबर तो राजा भैया बैरम खां..
लखनऊ। मुम्बई की मसाला फिल्मों में एक बहुत चर्चित डॉयलाग हैं, अपने इलाके में तो कुत्ता भी शेर होता है, या इलाके तो कुत्तों के होते है। यहां डॉयलाग को इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि इस डॉयलाग से ही आगे सारी बात स्पष्ट हो सकेगी। रघुराज प्रताप सिंह प्रतापगढ़ और खासतौर पर कुंडा के बाहुबली है। बाहुबलियों की एक खास आदत होती है कि वो अपने इलाके में कोई ऐसा काम नहीं करते जिससे उनकी बाहुबली छवि को धक्का लगे।
राजा भैया तो बाहुबली भी है और राजनीति के निपुण खिलाड़ी भी। वह जानते है कि अपने इलाके में सरेआम एक डीएसपी को ऑन ड्यूटी मार देना या मरवा देना उनके लिए कितनी बड़ी मुसीबत लेकर आएगा। आप भले ही इस बात पर विश्वास न करें लेकिन राजा भैया अचानक हुई एक घटना के बाद हुई राजनीति का शिकार हो गए हैं।
राजा भैया के खिलाफ हुई राजनीति की शुरुआत बहुत पहले ही हो गई थी। सपा जब 2012 में बसपा के खिलाफ चुनाव अभियान पर थी तो पश्चिम उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डी.पी. यादव सपा में आना चाहते थे।
यहां तक की आजम खां और शिवपाल यादव इसके लिए राजी थे और मुलायम भी विरोध नहीं कर रहे थे लेकिन अखिलेश जो उस समय चुनाव की बागडोर संभाले हुए थे और उत्तर प्रदेश के सपा अध्यक्ष थे, दागी डी.पी. यादव को पार्टी में न शामिल करने पर अड़ गए।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को अपने नौजवान कमानदार की बात मानने के लिए विवश होना पड़ा। उसी समय कुंडा से राजा भैया को समर्थन देने पर अखिलेश इस लिए तैयार हो गए क्योंकि उस समय अखिलेश भी नहीं जानते थे कि सपा बहुमत का आकड़ा पार कर जाएगी।जब सपा की सरकार बनी तब डीपी यादव वाली तर्ज पर अखिलेश कई दागी लोगों के साथ राजा भैया को मंत्री नहीं बनाना चाहते थे लेकिन तब यादव परिवार में ही कई वरिष्ठ अड़ गए और कहां गया कि इससे अमर सिंह के जाने के बाद क्षत्रियों को अपने साथ रखा जा सकेगा। वो समय ऐसा था कि अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाए जाने से खफा चल रहे सभी वरिष्ठों को साथ लेकर चलना था। अखिलेश नौजवान मुख्यमंत्री हैं, वह चाहते थे कि सरकार का मंत्रिमंडल ऐसा हो कि कोई अंगुली भी न उठा पाए।
लेकिन सरकार गठन के समय उन्हें कुछ लोगों को मजबूरी में अपने मंत्रिमंडल में रखना पड़ा। उस समय उनकी दशा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह हो गई थी। लेकिन जैसे ही उन्हें मौका मिला उन्होंने राजा भैया से कारागार मंत्रालय छीनकर अपने खास भरोसे वाले व्यक्ति राजेंद्र चौधरी को वह मंत्रालय थमा दिया। राजा भैया को हमेशा से कारागार मंत्रालय ही पसंद रहा है अब खाघ आपूर्ति का मंत्रालय भला उनके किस काम का। जहां बाहुबली होने का कोई लाभ नहीं मिलता।
मामला यहां तक भी चल जाता लेकिन सूत्र बताते है कि जब कुछ सिरफिरे नौजवानों ने लखनऊ में मायावती की मूर्ति तोड़ी तो अखिलेश ने एक जिम्मेदार मुख्यमंत्री की हैसियत से मायावती की दूसरी मूर्ति लगाकर राज्य को अराजकता से बचाया, लेकिन क्षत्रिय नेता होने और मायावती से व्यक्तिगत बैर रखने वाले राजा भैया के लोगों ने कई खास मौकों पर इस कार्रवाई को जल्दी में उठाया गया कदम करार दिया।
जब कुंडा में डीएसपी की हत्या हुई तो मामला इतना तूल न पकड़ता यदि शहीद डीएसपी की पत्नी ने राजा भैया का नाम न लिया होता। राजा भैया का नाम आते ही अखिलेश ने सरकार की छवि बचाने के नाम पर तुरंत राजा भैया से इस्तीफा मांग लिया। शहीद डीएसपी की पत्नी ने सरकार से जितने की मांग की सरकार ने उससे भी ज्यादा दिया।
यहां तक की उसकी मांग पर अखिलेश उससे मिलने गए और सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी और सीबीआई की जांच शुरू ही हुई थी कि एक कार्यक्रम में पत्रकारों से यह कह कर सीबीआई को इशारा भी कर दिया कि यदि सीबीआई राजा भैया को गिरफ्तार करती हैं तो राज्य सरकार पूरा सहयोग करेगी।
अखिलेश ने जो कहा वह तो किसी भी सरकार का फर्ज है, फिर उसे कहना क्यों जरुरी था क्योंकि अखिलेश सपा सरकार को राजा भैया जैसे बाहुबलियों की छवि से दूर करना चाहते है और उन लोगों को भी सबक सिखाना चाहते है जो ऐसे बाहुबलियों को मंत्रिमंडल में लेने की वकालत करते है। अकबर की तरह अखिलेश भी इस समय अपने कई बैरम खां से छुटकारा पाना चाहते है जिससे वह एक साफ सुथरी वाली सरकार चला सके।













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