फास्ट ट्रैक कोर्ट आतंकवाद के लिये क्यों नहीं?
नई दिल्ली। वोटों की राजनीति के लिए प्रदेशों में नक्सलवादियों के प्रति नरम रुख नहीं दिखाना चाहिए। आतंकवादियों को चिह्न्ति करके उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। खुफिया तंत्र को मजबूत बनाने के साथ साथ इनसे निबटने को केंद्र और प्रदेश सरकारों की इच्छाशक्ति भी जरूरी है।
आतंकवाद और नक्सलवाद के दोषियों को सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोटों में रोजाना सुनवाई होकर शीघ्र निर्णय होने चाहिए। अदालती निर्णयों में देरी और वोटों की राजनीति से देश में आतंकवाद और नक्सलवाद को बढ़ावा मिला है। देश में एक बार फिर आतंकी घटना हुई है। यह घटना हैदराबाद में हुई जिसमें 16 लोगों की मौत हुई है तथा 100 से अधिक घायल हुए। हैदराबाद में यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी हैदराबाद के अलावा मुंबई, दिल्ली, वाराणसी आदि अनेक शहरों में भी आतंकी घटनाओं की त्रासदी हो चुकी है।

हैदराबाद की घटना से तीन दिन पूर्व पाकिस्तान के क्वेटा शहर में हुई आतंकी घटना में 80 लोग मारे गए थे तथा सैकड़ों घायल हुए थे। भारत और पाकिस्तान के अलावा ईराक, ईरान, मिश्र, सऊदी अरब, अमेरिका और योरोप के देशों में भी यदा कदा आतंकी घटनाएं होती रही है। पूरा विश्व आतंकवाद के साये में जी रहा है।
भारत में आतंकवाद के अलावा नक्सलवाद की घटनाओं में भी लगातार वृद्घि हो रही है। बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, पश्चिमी बंगाल, असम तथा पूर्वोत्तर प्रदेश नक्सलवाद से जूझ रहे है। नक्सलियों के निशाने पर ज्यादातर सुरक्षा बलों के अधिकारी जवान रहते है। आए दिन किसी न किसी प्रदेश में नक्सली घटना में माइन ब्लास्ट या घात लगाकर हमला किये जाने से सुरक्षा बलों के अधिकारी व जवान मरते रहते हैं।
हैदराबाद की आतंकी घटना के दो दिन बाद ही बिहार के गया जिले में नक्सलियों द्वारा बिछाई गई बारूदी सुरंग में विस्फोट होने से 6 पुलिसकर्मियों सहित 8 की मौत हो गई। देश में भी हैदराबाद की आतंकी घटना पहली नहीं है। इससे पहले मुंबई की आतंकी घटना ने पूरे देश को हिला दिया था।
भाजपा के अटल बिहार वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के कार्यकाल में ससंद पर और लाल किले पर आतंकियों ने हमले करके बड़ी चुनौती दी थी। इसी सरकार के कार्यकाल में आतंकियों को काबुल ले जाकर छोड़ा गया था। इसी सरकार के कार्यकाल में कश्मीर में पाकिस्तान से घुसपैठियों के रूप में आंतकवादी पाक सेना की मदद से आए थे। इनसे भारतीय सेना को भारत के अंदर ही युद्ध करना पड़ा।
भारत के सैकड़ों सैनिक मारे गए बाद में इन्हें पाकिस्तान लौटने के लिए सुरक्षित रास्ता सैफ पैसेज देना पड़ा। इन सब घटनाओं का उल्लेख करने का मतलब यह है कि देश में सरकार किसी की भी हो कांग्रेस की हो या विपक्षी दलों की, संप्रग की या राजग की, आतंकवादी यहां आतंकी घटनाओं को अंजाम देने में सफल होते हैं।
आतंकवादी घटनाओं के पीछे मास्टर माइंड तो कोई बाहरी व्यक्ति हो सकता है लेकिन भारतीय नागरिकों के सहयोग के बिना कोई विदेशी आतंकी अकेले बलबूते पर आकर ऐसी घटनाओं को अंजाम नहीं दे सकता। प्रत्येक आतंकी घटना अचानक नहीं होती है। विस्फोटकों में विस्फोट के समय का टाइमर लगाया जाता है।
विस्फोटक पदार्थ भी यही से जुटाए जाते हैं यह सब बिना स्थानीय सहयोगियों के नहीं हो सकता है। इसी प्रकार जिन प्रदेशों में नक्सलवादी घटनाए हो रही है उन सभी प्रदेशों में किसी एक पार्टी की सरकार नहीं है। बिहार में जदयू और भाजपा की सरकार है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकारे है। असम में कांग्रेस की सरकार है। झारखंड में वर्तमान में राष्ट्रपति शासन है, इससे पहले भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा की मिली जुली सरकार है। पूर्वोत्तर प्रदेशों में भी विभिन्न दलों की सरकार है।
देश में या प्रदेशों में सरकार किसी भी पार्टी या मिलीजुली है लेकिन पिछले बीस वर्षो से आतंकवादी और नक्सली घटनाएं कम होने की बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। आतंकवाद के पीछे कट्टरवाद को बताया जाता है लेकिन कट्टरवादी अपने ही देश में भी आतंकवादी घटनाएं करने से नहीं चूक रहे हैं।
हैदराबाद की आतंकी घटना से एक बार फिर देश के खुफिया तंत्र की विफलता पर प्रश्नचिन्ह लगा है। पहले मुंबई हमले के दोषी कसाब को फांसी दी गई। उसके बाद संसद हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी दी गई। इन दो आतंकियों को फांसी दिए जाने के बाद यह तो निश्चित था कि आतंकवादी भी चुप नहीं बैठेंगे। अफजल गुरु की फांसी के बाद संभावित प्रतिक्रिया की आशंका से कश्मीर में एक सप्ताह तक कर्फ्यू भी लगाना पड़ा।
इसी बीच पाकिस्तान के क्वेटा में हुई आतंकी घटना के बाद भारत में भी ऐसी घटना की आंशका पैदा हो गई है। इसी आशंका को ध्यान में रखकर केंद्र ने राज्यों को सतर्क रहने की चेतावनी दी थी।
हैदराबाद सहित पांच शहरों को आतंकी निशाने पर बताया गया था। चेतावनी के बाद भी हैदराबाद की घटना खुफिया तंत्र की विफलता साबित करती है। संसद के दोनों सदनों में हैदराबाद की घटना के संबंध में केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने अपने बयान में माना कि खुफिया विभाग ने सामान्य अलर्ट जारी किया था उसमें पुख्ता जानकारी नहीं थी। विपक्ष ने इस घटना के लिए केंद्र सरकार की विफलता बताई।
जानकारी के बावजूद घटना को टाला नहीं जा सका। आतंकवाद और नक्सवाद दोनों ही राष्ट्रीय समस्याएं हैं। इनके लिए केंद्र या प्रदेश सरकारों अथवा राजनीतिक दलों में आपस में दोषारोपण नहीं होना चाहिए। सभी दलों को पार्टी और स्थानीय क्षेत्रीय हितों में ऊपर उठकर इससे निबटने में सहयोग करना चाहिए। राजनीति नहीं करनी चाहिए।
धर्म संप्रदाय के नाम पर आतंकियों का बचान नहीं करना चाहिए। वोटों की राजनीति के लिए प्रदेशों में नक्सलवादियों के प्रति नरम रूख नहीं दिखाना चाहिए। आतंकवादियों को चिन्हित करके उनके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। खुफिया तंत्र को मजबूत बनाने के साथ साथ इनसे निबटने को केंद्र और प्रदेश सरकारों की इच्छा शक्ति भी जरूरी है।
आतंकवाद और नक्सलवाद के दोषियों को सजा देने के लिए फास्ट ट्रैक कोटों में रोजाना सुनवाई होकर शीघ्र निर्णय होने चाहिए। अदालती निर्णयों में देरी और वोटो की राजनीति से देश में आतंकवाद और नक्सलवाद को बढ़ावा मिला है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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