नरेंद्र मोदी के आगे धरी रह गई, सारी पंडिताई
अहमदाबाद (कन्हैया कोष्टी)। गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 ने कई मिथक तोड़े हैं, तो कई मिथकों की लाज भी बचाई है। खासकर ऑपिनियन पोल और एक्जिट पोल को लेकर उठाए जाने वाले सवालों पर इन चुनाव परिणामों ने पूर्णविराम लगा दिया है। नरेंद्र मोदी की यह जीत श्वेता भट्ट के खिलाफ नहीं है, बल्कि तमाम राजनीतिक पंडितों के खिलाफ है।
दरअसल गुजरात में विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले तक हर ओर-चहुँओर माहौल मोदीमय था, लेकिन जैसे ही चुनाव नजदीक आए और कांग्रेस ने एक के बाद एक प्रलोभनकारी घोषणाओं का सिलसिला शुरू कर दिया। इसमें सबसे बड़ा लालच तो घर का घर योजना थी। इस योजना को लेकर कांग्रेस के नेता इतने उत्साहित थे कि उन्हें एहसास होने लगा था कि भले महिलाओं को घर का घर देने में पसीने छूट जाएँ, लेकिन अब चुनाव जीतने के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ेगा। बस फॉर्म भरवा लो और मत लूट लो। मानो चित्रकूट के धाम पर राम नाम की लूट मची हो।

इन सारी कहानियों के बावजूद चुनाव से डेढ़-दो माह पहले शुरू हुए विभिन्न चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में मोदी को भारी बढ़त दिखाई गई, तो उस पर किसी ने भरोसा नहीं किया। राजनीतिक पण्डित अपने व्यक्तिगत चश्मों और गुजरात की जन-भावना की अज्ञानता के वश अपने-अपने गणित लगाते रहे। कई राजनीतिक पण्डितों ने ऐसे सर्वेक्षणों को सिरे से खारिज कर दिया। इसके पीछे उनका परम्परागत तर्क भी था कि यह चंद हजार लोगों की राय है, जबकि गुजरात में पौने चार करोड़ मतदाता हैं।
खैर यह तो चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों की बात थी। अब मतदान के बाद और उसमें भी भारी मतदान ने तो राजनीतिक पण्डितों की नींद ही उड़ा दी। करते भी क्या? कोई तो कयास लगाना ही था। सीधे-सीधे कह देते कि भारी मतदान मोदी के पक्ष में हुआ है, तो पक्षपात के दोषी कहलाते। ऐसे में भारी मतदान को लेकर सत्ता विरोधी लहर के कयास की लहर शुरू हुई, लेकिन उन तथाकथित राजनीतिक पण्डितों के दिमाग में यह बात कहीं नहीं आ रही थी कि आखिर पिछले 11 सालों में, जिस दौरान केवल गुजरात में सामान्यतः विकास की ही चर्चा हुई है, ऐसा हुआ क्या कि सत्ता विरोधी लहर चल पड़ती।
और चलो मान भी लिया जाए कि मोदी से लोग नाराज थे, तो भला कांग्रेस ने इन 11 सालों में ऐसा क्या बड़ा काम कर दिया कि जनता के मन में उसके लिए प्रेम उमड़ जाए। फिर बात केशुभाई की करते हैं। 111 दिनों से सक्रिय केशुभाई ने भला पटेलों के लिए ही ऐसा क्या कर दिया कि सारे पटेल उनके पक्ष में चले जाते। और पटेल जाते, तो जाते, बाकी गुजरात उनके पक्ष में आंधी क्यों चलाता? और इस तरह गुजरात के चुनाव परिणामों ने राजनीतिक पण्डितों की पण्डिताई को धता बताया और यह सिद्ध कर दिया कि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भीषण आंधी के बीच भी मतदाता राजनीतिक परिपक्वता को ही महत्व देता है।












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