गुजरात में विरासत और वरिष्ठता पर भारी विशिष्टता
अहमदाबाद (कन्हैया कोष्टी)। गुजरात ने आज अपना जनादेश सुना दिया। दूध का दूध और पानी का पानी होता नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी के साथ-साथ नरेंद्र मोदी जीत की ओर अग्रसर हैं। इन रुझानों से यह साबित हो गया है कि विशिष्टता किसी की मोहताज नहीं होती। कितनी ही ऊँची, महान और ऐतिहासिक विरासत हो या फिर उम्र और अनुभव से बनी वरिष्ठता हो। जो विशिष्ट होता है, उसके आगे विरासत और वरिष्ठता दोनों ही नतमस्तक होने को विवश हो जाते हैं।
जी हाँ। हम यहाँ बात कर रहे हैं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और भारतीय जनता पार्टी में वरिष्ठता के आधार पर मोदी से अधिक कदावर नेताओं की, जिनकी लम्बी कतार है, परंतु नरेंद्र मोदी के जनसमर्थित विराट कद के आगे नेहरू-गांधी की ऐतिहासिक विरासत का गुणगान करने वाले राहुल और भाजपा में ही लालकृष्ण आडवाणी सहित अनेक पुराने एवं अनुभवी नेता बौने ही साबित हुए हैं।

सबसे पहले राहुल गांधी को ही ले लेते हैं। उनका नंबर इसलिए भी पहले आता है, क्योंकि लोकसभा चुनाव 2014 में वे ही कांग्रेस की नैया के खेवैया बनाए गए हैं। दो माह पहले ही राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव 2014 के लिए कांग्रेस चुनाव समन्वय समिति का मुखिया बनाया गया है और उन्हें आज के चुनाव परिणामों के साथ ही यह इल्म भी हो गया होगा कि अब उनका मुकाबला मोदी रूपी महामाया से होने की पूरी-पूरी संभावना बन गई है।
राहुल की राजनीति
राहुल ने जब कांग्रेस की चुनाव समन्वय समिति की कमान संभाली, तभी हमने यह जता दिया था कि उनकी पहली परीक्षा गुजरात में होगी और यदि वे गुजरात में सफल रहे, तो मोदी रूपी बढ़ती आंधी का सामना करने से बच जाएँगे, लेकिन इन महाशय ने गुजरात में आकर नेहरू-गांधी का गुणगान किया। एक कथा सुनाई और कुछ सवाल पूछे। बस हो गया... अब शायद वे समझ गए होंगे कि नेहरू-गांधी की ऐतिहासिक विरासत साथ होने मात्र से चुनावी जीत की गारंटी नहीं मिल जाती। अरे हद तो तब हो जाती है, जब 2014 के राष्ट्रव्यापी चुनाव का नेतृत्व करने वाला एक व्यक्ति धनुष-बाण लेकर विरोधी को परास्त करने को तैयार तो है, परंतु विरोधी का नाम लेने से कतरा रहा है। यह भय नहीं तो क्या था? प्रश्न यही उठता है कि पराजय बुरी है या उसका भय? केवल पराजय के भय से राहुल गांधी ने गुजरात की चुनाव सभाओं में मोदी का नाम तक नहीं लिया। यह उनकी विशिष्टता नहीं, बौखलाहट साबित हुआ।
यह तो बात हुई वरिष्ठता की। यह तो पहले से ही सुना जा रहा था कि मोदी यदि गुजरात का पड़ाव ऊँची छलांग लगा कर पार करते हैं, तो फिर भाजपा के भीतर उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को लेकर चल रही सुगबुगाहट और चिंगारी आग की ज्वाला का रूप ले सकती है। और अब यह होना भी है। सुगबुगाहट और चिंगारी को तो यह कह कर दबा दिया जाता रहा कि भाजपा में प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवारों में मोदी भी शामिल हैं, लेकिन केवल मोदी नहीं हैं। अब मोदी की चुनावी विजय की विशिष्टता और मोदी से तजुर्बे और उम्र में बड़े वरिष्ठ नेताओं पर नजर दौड़ाते हैं।
सफलता की नींव आडवाणी
सबसे पहला नाम आता है लालकृष्ण आडवाणी का। बेशक आडवाणी का राम मंदिर आंदोलन ही भाजपा की देशव्यापी सफलता की नींव में है, लेकिन वह राम जो सत्ता न दिला सके, वह किसी राजनीतिक पार्टी के लिए कब तक काम के होंगे? फिर भाजपा एनडीए के रूप में सत्ता में आई भी और अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे कदावर नेता प्रधानमंत्री बने, लेकिन वह सत्ता लम्बी नहीं टिक सकी। भाई वाजपेयी की पूछ भी तो उनकी विशिष्टता को लेकर ही थी। आडवाणी का नेतृत्व लोकसभा चुनाव 2009 की परीक्षा से गुजर चुका है। ऐसे में वे भले आज भी पीएम इन वेटिंग हों, परंतु आज के चुनाव परिणामों के बाद तो उन्हें भी मोदी की सरदारी स्वीकारने को विवश होना ही पड़ेगा। आखिर पार्टी की जीत ही प्रथम लक्ष्य होता है।
बेबाक सुषमा स्वराज
फिर बात आती है सुषमा स्वराज की। एक बेबाक वक्ता के रूप में भाजपा को अभिव्यक्त करने वाली नेता के रूप में सुषमा सौ फीसदी सफल हैं, परंतु दिल्ली के दिल की रानी बनने का मौका वे चुनावी जीत के साथ भुना न सकीं। अरुण जेटली स्वयं राज्यसभा सदस्य हैं और जनाधार के नाम पर उन्हें चुनावी परीक्षा में उतारने की जुर्रत शायद ही भाजपा कर सकेगी। नितिन गडकरी को लें, तो वे भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं। रही बात राजनाथ सिंह या वैंकेया नायडू की, तो राजनाथ उत्तर प्रदेश में फेल रहे हैं, तो वैंकेया दक्षिण के गढ़ तक सीमित हैं। ऐसे में एकमात्र विकल्प मोदी ही बचते हैं। यदि पार्टी व्यक्तिवाद से ऊपर उठ कर पार्टी की जीत को लक्ष्य बनाए, तो फिर मोदी की विशिष्टता इन सारी वरिष्ठताओं पर भारी ही पड़ेगी।












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