आखिरी जंग : पार्टी पराजय यानी इनका पराभव !

अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा चुनाव 2012 मुख्यतः तीन महत्वपूर्ण राजनेताओं के आसपास केन्द्रित हैं और इन तीनों नेताओं के लिए इस चुनाव में पराजय का मतलब होगा राजनीतिक पराभव। जी हाँ। यहाँ हम खुलासा करना चाहेंगे कि पराजय अर्थात् उनकी व्यक्तिगत या किसी एक विधानसभा क्षेत्र से पराजय नहीं, बल्कि वे जिस पार्टी में हैं, उस पार्टी की पराजय। पार्टी की चुनावी पराजय होने के साथ ही इन तीनों नेताओं का राजनीतिक पराभव तय दिखाई देता है।

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चलिए, अब आपको इन तीनों महानुभावों के नाम भी बता दें। इनमें सबसे ऊपर हैं मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी। दूसरा नाम है कभी गुजरात भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भीष्म पितामह की भूमिका निभाने वाले और फिलहाल गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) के नाम से अलग पार्टी बना कर गुजरात के चुनावी मैदान में कूदने वाले पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल, तो तीसरा नाम भी बहुत ही प्रसिद्ध और दबंग-मंझे हुए प्रकार का है। यह है शंकरसिंह वाघेला। एक समय भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) में रह कर देशभक्ति तथा हिन्दुत्व के प्रखर हिमायती रहे वाघेला इस वक्त कांग्रेस पार्टी में हैं। एक विशिष्टता भी है कि ये तीनों नेता अतीत में एक साथ कंधे से कंधा मिला कर भाजपा के लिए काम कर चुके हैं।

नरेन्द्र मोदी

भाजपा नेता और लोकसभा चुनाव 2014 में पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के लिए प्रबल दावेदारों में एक नरेन्द्र मोदी पहली बार 2002 में कोई चुनाव लड़े थे। मोदी इससे पहले केवल संगठन में ही काम करते थे। 7 अक्टूबर, 2001 को भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल को हटा कर मोदी को गुजरात की गद्दी सौंपी और मोदी पहली बार चुनावी राजनीति में कूदे। उन्होंने अपने जीवन का पहला चुनाव फरवरी-2002 में राजकोट-2 विधानसभा सीट से लड़ा था। वह उप चुनाव था। फिर 2002 तथा 2007 में वे स्वयं मणिनर सीट से जीते। हालाँकि उनकी जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण उनके द्वारा भाजपा को लगातार दो बार बहुमत में लाना महत्वपूर्ण है। मोदी लगातार दो बार चुनाव जीत कर गुजरात में पिछले ग्यारह वर्षों से मुख्यमंत्री पद पर बने हुए हैं।

परंतु... मोदी इस चुनाव में हार जाएँ तो? नहीं भैया... हम मोदी के मणिनगर से चुनाव हारने की बात नहीं कर रहे। हमारा सवाल है यदि मोदी के नेतृत्व में भाजपा बहुमत हासिल न कर सकी तो? ऐसे हालात में भाजपा तो आज नहीं, तो कल सत्ता पर लौट सकती है, परंतु मोदी के लिए यह पराजय उनके राजनीतिक पराभव का कारण बन सकता है। एक बात सो सभी जानते हैं कि मोदी के खिलाफ साम्प्रदायिक दंगे और फर्जी मुठभेड़ जैसे अनेक आरोप लगाए गए हैं। यदि वे सत्ता से हट गए, तो फिर संभव है कि नई सरकार उन्हें कानूनी शिकंजे में लेने का प्रयास करेगी। दूसरी ओर पार्टी में इस वक्त जहाँ उनका नाम ठेठ प्रधानमंत्री पद के दावेदारो में लिया जाता है और यदि वे गुजरात में हार जाएँ, तो उनका राजनीतिक कद बिल्कुल रसातल में पहुँच जाएगा। उनकी कार्यशैली और स्वाभिमानी अंदाज को देख कर यह कहना मुश्किल है कि मोदी विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता के रूप में विराजें। इन तमाम संभावनाओं और आशंकाओं से स्पष्ट है कि इस चुनाव में भाजपा की पराजय मतलब मोदी का राजनीतिक पराभव साबित हो सकती है।

केशूभाई पटेल

गुजरात में जनसंघ और फिर भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल वयोवृद्ध राजनेता केशूभाई पटेल वैसे तो अब खुल कर बाहर आ गए हैं। अब तक भाजपा में रह कर नेतृत्व और मोदी का विरोध करने वाले केशूभाई पटेल ने भाजपा से अलग होकर नई गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाई और विधानसभा चुनाव 2012 में मोदी को चुनौती दी है। केशूभाई का एकमात्र उद्देश्य मोदी को पराजित करना है।

परंतु... यदि ऐसा न हुआ हो? केशूभाई गुजरात में 1995 में पहली बार बनी भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री बने थे। हालाँकि सात माह में ही उनकी सरकार गिर गई थी। शंकरसिंह वाघेला ने विद्रोह कर भाजपा से अलग होकर और फिर कांग्रेस के समर्थन से अपनी सरकार बनाई, लेकिन समर्थन वाली यह सरकार चली नहीं। 1998 में हुए मध्यावधि चुनाव में केशूभाई पटेल पुनः सत्ता में लौटे। केशूभाई ने स्पष्ट रूप से देखा कि पार्टी के साथ बगावत करने वाले वाघेला को गुजरात की जनता ने सबक सिखाया। इसके बावजूद केशूभाई आज वाघेला के ही रास्ते चल निकले हैं। यदि केशूभाई की पार्टी इस चनाव में पराजय का सामना करती है, तो उम्र के लिहाज से केशूभाई पटेल कदाचित अगले चुनाव 2017 में सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनने के योग्य नहीं रहेंगे। ऐसे में केशूभाई पटेल के लिए इस चुनाव की पराजय उनका राजनीतिक पराभव का कारण बन सकती है।

शंकरसिंह वाघेला

गुजरात में सशक्त तथा दबंग क्षत्रिय नेता के रूप में प्रसिद्ध शंकरसिंह वाघेला कांग्रेस पार्टी में हैं। वे भी गुजरात में जनसंघ तथा भाजपा के संस्थापक सदस्यों में एक हैं। वाघेला कभी गुजरात भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, लेकिन 1995 में पहली बार जब गुजरात में भाजपा को बहुमत मिला, तो पार्टी ने उन्हें हासिये पर धकेल कर केशूभाई पटेल को मुख्यमंत्री बना दिया। बस, तभी से वाघेला पार्टी से नाराज हुए और उनकी नाराजगी ने मात्र सात महीने में ही केशूभाई पटेल सरकार पर ग्रहण लगा दिया। वाघेला ने पार्टी के कुछ विधायकों को तोड़ा और केशूभाई सरकार गिर गई। हालाँकि बीच के रास्ते के रूप में केशूभाई की जगह सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री पद पर बैठाया गया, परंतु वे भी लंबा न खींच सके। अंततः सुरेश मेहता सरकार गिरने के बाद राष्ट्रपति शासन लगाया गया। फिर निलंबित विधानसभा के दौरान वाघेला ने राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) का गठन कर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली।

1996 में वाघेला कांग्रेस के समर्थन से पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए। वे भी केवल एक साल ही सरकार चला सके। कांग्रेस के दबाव के आगे वाघेला को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा और बीच के रास्ते के रूप में राजपा से वाघेला के प्रबल समर्थक दिलीप परीख को मुख्यमंत्री बनाया गया। परीख भी ज्यादा नहीं टिक सके और दो साल की राजनीतिक अस्थिरता के बाद गुजरात में 1998 में मध्यावधि चुनाव आ गए। वाघेला ने फिर कांग्रेस की शरण ले ली, परंतु कांग्रेस में उनकी कद्र नहीं हो सकी। विधानसभा चुनाव 2002 में कांग्रेस ने वाघेला के नेतृत्व में चुनाव लड़ा, परंतु मोदी के आगे उनकी एक न चली। 2004 में वाघेला लोकसभा चुनाव जीते और केन्द्रीय मंत्री भी बने। केन्द्र में सत्ता होने के बावजूद विधानसभा चुनाव 2007 में वाघेला कोई प्रभाव न छोड़ सके और कांग्रेस हार गई। लोकसभा चुनाव 2009 में तो वाघेला स्वयं ही पंचमहाल से चुनाव हार गए। अब फिर एक बार पार्टी ने उन्हें विधानसभा चुनाव 2012 की बागडोर सौंपी है। उन्हें कांग्रेस चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।

परंतु... यदि इस बार भी कांग्रेस पार्टी हार गई तो? बढ़ती उम्र को देखते हुए वाघेला के लिए इस चुनाव में पार्टी की पराजय कम से कम गांधीनगर की सत्ता की दावेदारी के मामले में तो राजनीतिक पराभव के समान ही कहलाएगी, क्योंकि यदि कांग्रेस हार गई और मोदी पुनः सत्ता में लौटे, तो ऐसे हालात में नए चुनाव 2017 में होंगे। तब तक वाघेला शायद बढ़ती उम्र के आगे लाचार भी हो चुके होंगे। अतः कहा जा सकता है कि वाघेला के लिए भी इस चुनाव में उनकी पार्टी की पराजय उनके राजनीतिक पराभव का कारण बन सकती है।

काशीराम राणा

उपरोक्त चित्र में गुजरात भाजपा के चार स्तंभ एक साथ चर्चा करते दिखाई दे रहे हैं। इनमें से तीन के बारे में तो आपको बताया। अब दिवंगत काशीराम राणा की भी बात कर लेते हैं। राणा भी शुरू से ही भाजपा के साथ थे, परंतु वे भी मोदी के नेतृत्व से नाराज थे। इतना ही नहीं, उन्हें लोकसभा चुनाव 2009 में पार्टी की ओर से टिकट तक नहीं दिया गया। उनका असंतोष उस समय खुल कर सामने आ गया, जब केशूभाई ने नई पार्टी बनाई। राणा केशूभाई की जीपीपी से जुड़ गए। राणा भी गुजरात भाजपा में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों में एक थे। उनकी यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा कभी पूरी न हो सकी। हालाँकि वे केन्द्र में वाजपेयी सरकार में मंत्री बने थे, परंतु गुजरात में मोदी के नेतृत्व के खिलाफ वे केशूभाई के साथ हो लिए। जीपीपी की बैठक में वे भाग लेने के लिए सूरत से अहमदाबाद आए और अचानक दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। उनके भविष्य के बारे में अब कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं है।

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