नरेंद्र मोदी दबंग और दुनिया दंग
अहमदबाद। सलमान खान की फिल्म दबंग तो आपने देखी ही होगी। उनकी दबंगई तो ऐसी चल निकली कि अब दबंग 2 बन रही है और फिर सिक्वल के इस दौर में शायद दबंग 3, 4, 5... छोड़िए। गिनती का कहाँ कोई अंत है। हम बात कर रहे हैं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की। उनकी दबंगई के किस्से भी सिक्वल की तरह चलते ही रहते हैं। कभी खत्म ही नहीं होंगे शायद।
इन दिनों गुजरात चर्चा में है। कोई भी राज्य अक्सर चुनावों के दौरान चर्चा में रहता ही है। जब गुजरात का नाम चर्चा में है, तो फिर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम भी चर्चा में रहना स्वाभाविक है, लेकिन मोदी के लिए चर्चा शब्द छोटा पड़ता लगता है, क्योंकि मोदी गोधरा कांड-2002 से लेकर लगातार चर्चा में ही रहते आए हैं। ऐसे में चुनावों के दौरान उनके नाम को चर्चा में नहीं, बल्कि महाचर्चा में कहना चाहिए।

चुनावी बयार के बीच कल खबर आई कि ब्रिटिश सरकार गुजरात के साथ द्विपक्षीय सम्बंध बढ़ाना चाहती है। ब्रिटिश सरकार की यह मंशा केवल एक सामान्य मंशा मात्र नहीं है। ब्रिटिश सरकार ने उसी गुजरात के साथ सम्बंध बढ़ाने की पहल की है, जिसके मुखिया नरेन्द्र मोदी हैं और जिन पर गोधरा कांड के बाद गुजरात में भड़के साम्प्रदायिक दंगों में भूमिका का आरोप लगा कर ब्रिटिश सरकार ने गुजरात से सम्बंधों पर 2002 में ही रोक लगा दी थी। अब यदि दस साल बाद ब्रिटिश सरकार तंद्रा से जागी है, तो इसे मोदी का दबंग नेतृत्व का ही करिश्मा कहा जाएगा। गुजरात में मोदी ग्यारह साल से शासन कर रहे हैं।
निर्बाध नेतृत्व, गुजरात नाम का रटन और विकास की धुन ने उन्हें गुजरात ही नहीं, देश की राजनीति में अनेकों बार दबंग साबित किया है। मोदी ने अपने मजबूत नेतृत्व के जरिए गुजरात का विकास तो किया है। अब कितना और कैसा किया है? इसका फैसला जनता करेगी, लेकिन उसके चर्चे इतने जोर-शोर से किए कि आज ब्रिटेन को गुजरात के साथ सम्बंध शुरू करने पर विवश होना पड़ा है, तो यदि मोदी गुजरात विधानसभा चुनाव-2012 जीतते हैं, तो निश्चित तौर पर अमरीका को भी मोदी को वीजा देने पर लगी रोक हटाने पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा।
कई बार साबित किया खुद को
मोदी यदि आज देश और दुनिया में दबंग और मिसाल बन चुके हैं, तो इसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत भी है। उन्होंने अपने विरोधियों के समक्ष खुद को कई बार साबित किया है। 2002 में तो मान लीजिए कि साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे मोदी जीत गए, लेकिन 2007 के चुनाव भी मोदी ने दबंग नेतृत्व और अनेक विरोधों-अंतर्विरोधों के बावजूद चीत कर दिखाए थे। वाइब्रेंट गुजरात निवेशक सम्मेलन हो या फिर टाटा की नैनो के स्वयंवर में धनुष तोड़ने का सवाल हो।
घरेलू आरोपों और कांग्रेस जैसी सबसे पुरानी पार्टी, जिसकी केन्द्र में सत्ता भी है, उसके सामने भी मोदी हर कसौटी से सफलतापूर्वक पार उतरते रहे हैं। काम करने की जिद, अपनी कार्यशैली के अनुसार ही चलने की उनकी जिद भी कहीं न कहीं उनके दबंग नेतृत्व का परिचायक है। वरना गुजरात में मोदी के कद के बराबर नेता तो काफी रहे, लेकिन आज सारे बिखर चुके हैं और भाजपा स्वयं मोदी पर आकर सिमट गई है। यह बात और है कि मोदी कभी भी खुद को पार्टी से ऊपर नहीं मानते, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि भाजपा गुजरात में आज मात्र मोदी पर निर्भर है और यदि मोदी यहाँ सफल रहे, तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में चल रहा घमासान मोदी पर आकर सिमट ही नहीं जाएगा, बल्कि खत्म भी हो जाएगा।
चुनावी फायदा, आचार संहिता से परे
वैसे गुजरात में चुनावों की घोषणा हो चुकी है। चहुंओर गुजरात की ही चर्चा है। मोदी के लिए इन चुनावों को राष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पर मुहर के रूप में देखा जा रहा है। इस गहमागहमी के बीच मोदी के दबंग नेतृत्व पर जब ब्रिटिश सरकार की मुहर लगी, तो जाहिर सी बात है कि चुनाव में मोदी को इसका फायदा अवश्य मिलेगा। आम तौर पर चुनावों की घोषणा के बाद कोई सत्तारूढ़ सरकार जनता के लुभाने वाली घोषणाएँ नहीं कर सकती, परंतु मोदी के लिए ब्रिटिश सरकार की ओर से की गई पहल चुनावी फायदा बन कर आई है और ऐसा फायदा कि जो चुनाव आयोग की आचार संहिता से परे है।
जब विरोधियों को भी उतरना पड़ा बचाव में
मोदी का मुद्दा गुजरात से बाहर विदेशों में भी हमेशा गूंजता रहा है। पहली बार मोदी को उनके नाम को विदेशों में गुंजायमान करने का अवसर जहाँ ब्रिटेन ने 2002 में द्विपक्षीय सम्बंधों पर रोक लगा कर दी, वहीं मार्च-2005 में अमरीका ने वीजा देने से इनकार कर मोदी के कद को नकारात्मक दृष्टिकोण से ही सही, काफी ऊँचा कर दिया। अमरीकी सरकार का वह फैसला ऐसा था कि जिसके खिलाफ स्वयं मोदी के विरोधियों को भी प्रतिक्रिया देनी पड़ी थी। स्वयं तत्कालीन विदेश मंत्री नटवर सिंह ने अमरीकी सरकार के निर्णय को अनुचित ठहराते हुए कहा था कि गुजरात दंगों को लेकर अमरीका की ओर से मोदी को वीजा न दिया जाना भारत के आंतरिक मामलों में दखल समान है। यह भारत की सम्प्रभुता पर चोट है, तो गुजरात में सतत मोदी नाम के विरोध की माला जपने वालों को भी अमरीका के निर्णय के खिलाफ बेमन से ही सही, बयान देने पड़े थे।
विराट सोच, वामन कांग्रेस
मोदी के इस विराट कद के आगे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जहाँ फीके पड़ जाते हैं, तो फिर गुजरात कांग्रेस तो कहाँ ठहर सकती है। गुजरात में कांग्रेस ने पिछले कुछ दिनों से चुनावी घोषणाओं का सिलसिला शुरू किया है। घर नुं घर योजना के फॉर्म बँट रहे हैं। अभी कल ही जहाँ देश भर में मोदी और ब्रिटिश सरकार की खबरें चर्चा में थीं, वहीं गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष अर्जुन मोढवाडिया एक और चुनावी घोषणा करने में व्यस्त थे।
उन्होंने कहा कि यदि गुजरात में कांग्रेस सत्ता पर आई, तो अल्पसंख्यकों के लिए अलग मंत्रालय बनेगा। एक तरफ जहाँ मोदी प्रवासी गुजराती, ग्लोबल वॉर्मिंग, क्लाइमेंट चेंज जैसे मुद्दों पर अलग मंत्रालय की विराट सोच रखते हैं, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस की इस तरह की घोषणाएँ तुच्छ और वामन लगती हैं। जहाँ मोदी की सोच के अनुसार यदि किसी गाँव में नर्मदा का पानी पहुँचता है, तो वह पूरे गाँव को मिलता है। उसमें बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक सारे आ जाते हैं और दूसरी तरफ कांग्रेस की वामन विचारधारा उसे अलग अल्पसंख्यक मंत्रालय बनाने जैसे मुद्दे सुझाती है। अब आप ही बताइए, कैसे निपट सकेगी कांग्रेस मोदी से?












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