पाक अधिकृत कश्मीर पर एंटनी की सपाटबयानी के मायने

उन्होंने कहा कि समूचा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। और समूचे जम्मू-कश्मीर में सियाचिन समेत इस रियासत का वह हिस्सा भी शामिल है जिस पर पाकिस्तान गैर-कानूनी ढंग से जबरन कब्जा जमाए बैठा है। जी हां, उनका अभिप्राय गिलगित-बाल्टिस्तान समेत सारे पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से था। एंटनी इतना कह कर नहीं रूके। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अगर कोई काम अधूर पड़ा है तो वह पाकिस्तान के नाजायज कब्जे वाली भारतीय भूमि को वापस प्राप्त करने का है।
बतौर रक्षा मंत्री एंटनी ने जो कहा वह कोई नई बात नहीं थी। मगर उनकी टिप्पणी की खासी अहमियत है चूंकि यह टिप्पणी उस भारतघाती चिंतनधारा से मेल नहीं खाती जिसके सहारे पत्रकार दिलीप पडगांवकर की अगुआई वाली वार्ताकारों की तिकड़ी जम्मू-कश्मीर की समस्या का समाधान तलाशने की कोशिश कर रही है। वह सोच जो जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तानी कब्जे वाले हिस्से का पाक-प्रशासित कश्मीर करार देकर पाकिस्तानी कब्जे को गुपचुप वैधता प्रदान करने की बात करती है। रक्षामंत्री की बात में जो धार है वह वार्ताकारों की तिकड़ी द्वारा रचे गए अलगाव-राग से एकदम विपरीत कहीं जा सकती है।
रक्षामंत्री के वक्तव्य में निहित भाव भारत की संसद के सामूहिक 1994 के संकल्प के साथ-साथ भारतीय जन-मानस के मनोभावों की भी अभिव्यक्ति हैं। युवा भारत तो कम से कम इस बात को लेकर खासा आहत है कि जिन मामलों में दिल्ली को दमदार ढंग से हुंकार भरनी चाहिए वहां अक्सर ‘पिलपिले‘ स्वर सुनाई देने लगते हैं। ऐसे में दिल्ली से जब जब कोई इस तरह की दो टूक व दमखम वाली बात कही जाती है तो उससे दुश्मनों की रीढ़ में ही सिहरन नहीं होती, भारतीय सेना, आम नागरिकों व उनमें भी खासकर युवजन की शिराएं तरंगित हो उठती हैं। ऐसे में एंटनी महोदय ने जो कहा उसका सर्वदिक अभिनंदन होना स्वाभाविक है। मीडिया ने कायदे से उनके बयान को जन -जन तक पंहुचाया होता तो और बेहतर होता।
यहां एक अहम बात यह भी है कि रक्षा मंत्री सदन में अपनी निजी हैसियत से नहीं बोल रहे थे। उन्होंने जो कहा वह भारत सरकार की आधिकारिक नीति व चिंतन दिशा भी है, ऐसा न मानने की कोई वजह नहीं। परंतु जब हम यह मानकर चलना चाहते हैं तभी यह सवाल मन में उठता है कि अगर यही भारत सरकार की नीति और चिंतनधारा है तो फिर पडगांवकर और उनकी मंडली की ‘देशघाती‘ रिपोर्ट को केंद्र सरकार ने सिरे से नकारते हुए रद्दी की टोकरी में क्यों नहीं फेंका?
भारत के स्थापित कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक दृष्टिकोण को ताक पर रखने का दुस्साहस जिस प्रतिवेदन में किया गया हो, भारत सरकार के गृहमंत्रालय ने उसे लोगों के विचारार्थ अपनी वेबसाइट पर क्या सोचकर अपलोड किया? इतना ही नहीं जम्मू-कश्मीर पर अलगाव का अलाव सुलगाने वाली रपट पर देशव्यापी बहस छेड़ने के लिए भी मंत्रालय ने इन्हीं ‘फाइकुल‘ अनुगामियों को विषय -विशेषज्ञ घोषित कर देशभ्रमण पर निकलने के लिए अधिकृत कर दिया। इन परस्पर विरोधाभासी नजरियों में दिल्ली का भ्रम झलक रहा है या कमजोरी, फिलहाल कहना कठिन है। यह भ्रम हो या कमजोरी, देश हित में तो कतई नहीं है।
भ्रमण पर ‘भ्रम‘ के कारोबारी...
गृहमंत्रालय की ओर से गठित वार्ताकार समूह एक बार फिर जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर आने वाला है। मकसद है उनकी अपनी दी हुई रिपोर्ट पर वहां के लोगों की प्रतिक्रिया जानना। यह भी कहा जा रहा है कि वे अपनी ही सिफारिशों को लोगों की राय के अनुरूप ‘रिविजिट' अर्थात संशोधित भी कर सकते हैं। मगर उन्होंने जब राज्य के सभी जिलों का नए सिरे से दौरा करने की इजाजत मांगी तो राज्य के हालात में अभूतपूर्व सुधार का दावा करने वाली उमर सरकार ने अज्ञात कारणों से उन्हें गिने-चुने स्थानों पर ही जाने की इजाजत देने के संकेत दिए है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ‘तिकडी‘ की योजना कश्मीर के सभी हिस्सों में जाने की थी। मगर सरकार की ओर से उन्हें श्रीनगर में डेरा डालकर अपना काम करने के लिए कह दिया गया है। सरकार की इस प्रतिक्रिया के दो अर्थ हो सकते हैं। पहला यह कि वार्ताकारों को आतंकवादियों से खतरा है। परंतु यह खतरा तो तब भी था जब यह तिकड़ी 11 महीने तक हर सप्ताह ‘समाधान‘ की तलाश में जम्मू-कश्मीर के सैर-सपाटे पर जाती रही। अब इनके लिए खतरा बढ़ने की वजह क्या हो सकती है जबकि इनके द्वारा की गई सिफारिशें कमोबेश भारत-विरोधी तत्वों को रास आने वाली हैं। कौन नहीं जानता कि ‘तिकड़ी‘ की सिफारिशों पर मुलम्मा चाहे जो चढ़ा हो, वे अंततः उन सभी तत्वों के लिए काम की हैं जो जम्मू -कश्मीर राज्य के भारत के साथ संबंध को क्षीण करना चाहते हैं। जो विलय के अंतिम व कानूनी सत्य को चुनौती देते हैं।
हां,वार्ताकारों को वास्तविक खतरा आमजन की तल्ख प्रतिक्रिया का हो सकता है। यह खतरा अधिक व्यावहारिक प्रतीत होता है। इसके स्पष्ट कारण मौजूद हैं। दरअसल घाटी को छोड़कर शेष प्रांत की आकांक्षाओं और जनभावनाओं की वार्ताकारों की रिपोर्ट में कोई खास कद्र नहीं हुई है। वार्ताकारों की विवादास्पद और अपने आप में भारतघाती व भितरघाती रिपोर्ट पर भी वहीं अंतरर्निहित विकलांगता हावी है, जो आज तक जम्मू कश्मीर को समझने का प्रयास करने वाले ज्यादातर ‘तथाकथित‘ बुद्धिजीवियों के नजरिए पर छायी रही है। रिपोर्ट और इसमें समाहित सिफारिशें नितांत घाटी-केंद्रित हैं। जबकि जम्मू-कश्मीर की समूची रियासत,जिसमें कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर भी शामिल है, में घाटी एक छोटा सा हिस्सा है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों को फिलहाल इस चर्चा से अलग रख कर देखें तो भी राज्य के तीन स्पष्ट हिस्सें हैं। इनमें से जम्मू और लद्दाख के अलावा कश्मीर के करगिल सरीखे शिया-बहुल इलाकों का आमजन भी स्वभाव से भारत-प्रेमी है। घाटी में भी एक तबका भले ही पाकिस्तान से मिलने वाली आर्थिक और वैचारिक खुराक के दम पर अलगाव-गीत गाता हो, वहां भी भारतभक्तों की मौजूदगी को एकदम नकारा नहीं जा सकता।
उधर, राज्य के दूसरे हिस्सों का दर्द यह है कि दिल्ली उन्हें आज तक उनके भारत-भक्त होने का इनाम घाटी वालों की तुलना में उनकी उपेक्षा करके देती आई है। वार्ताकारों की रिपोर्ट ने भी उनकी मूल आकांक्षाओं की अवहेलना कर जिस तरह घाटी-राग अलापने का पाप किया है, उसको देखते हुए इस बात की प्रबल संभावना है कि वार्ताकारों को घाटी के बाहर व्यापक प्रतिरोध का सामना करना पडे़गा। उमर सरकार ने वार्ताकारों को अपना काम श्रीनगर तक ही सीमित रखने की सलाह शायद इन प्रतिक्रियाओं की आशंका के चलते ही दी हो।
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