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राष्‍ट्रपति राजनीतिक हो या गैर राजनीतिक व्‍यक्ति?

Union Finance Minister Pranab Mukherjee
[डा. आलोक चांटिया] यूपीए के कैम्‍प से लहर उठी है कि सत्‍ताधारी गठबंधन राष्‍ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम का प्रस्‍ताव रखने जा रही है। वहीं अन्‍य दल अपने-अपने संभावित प्रत्‍याशियों के नाम सुर्खियों में पहले ही ला चुकी है। राष्‍ट्रपति कौन होगा, यह तो चुनाव के बाद पता चलेगा। फिलहाल चर्चा का विषय यह है कि प्रणब मुखर्जी या फिर किसी राजनीतिक पृष्‍ठभूमि के व्‍यक्ति राष्‍ट्रपति पद के लिए उचित है या नहीं। चर्चा इस पर भी जरूरी है कि उमीदवार राजनैतिक पृष्ठभूमि का होना चाहिए या नहीं।

आप सभी को पता है कि भारत में राष्ट्रपति जो भारत का प्रथम नागरिक है उसकी वैधानिक स्थिति क्या है? यह तक वह किसी कानून को पुनरावलोकन के लिए भी संसद में सिर्फ एक बार भेज सकता है यानि वह सिर्फ एक मुहर की तरह है और यह एक सामान्य सी अवधारणा बन गई है कि किसी भी व्यक्ति की राजनैतिक सक्रियता ख़त्म करनी हो तो उसको राष्ट्रपति या राज्यपाल के पद पर बैठा दो।

आज यही कारण है कि अपनी राजनैतिक हत्या से उबरने के लिए हर वो व्यक्ति छटपटाता दिखाई देता है, जिसे राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने की कोशिश की जाती है। अगर इस पद में एक बेहतर भविष्य का सार होता तो समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष श्री मुलायम सिंह यादव ने यह कह कर इंकार न किया होता कि मैं जनता के आदेश से खुश हूँ, जबकि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री व उनके पुत्र हैं। तो फिर मुलायम जी की क्या इच्छा है इस पर चर्चा की जरूरत नही है।

शरद पवार ने भी पानी उम्मीदवारी ओ ख़ारिज कर दिया और यही नही एक दम दर कांग्रेस के नेता के रूप में प्रणव मुखर्जी का नाम जिस तरह उछल रहा है और जिस तह वह भी इंकार कर रहे हैं, उस से तो यही लगता है राष्ट्र का प्रथम नागरिक एक राजनैतिक व्यक्ति स्वयं पाने मन से तो कतई नही बनना चाहता और राजनैतिक पार्टी ऐसे लोगो का समर्थन भी नही करना चाहती जिनसे उनके हितो को ज्यादा हानि पहुंचे।

टी एन शेषण को राष्ट्र पति न बनने देना और पूर्व राष्ट्रपति कलाम के लिए दोबारा राष्ट्रपति बनाये जाने के लिए सहमती न बनना, इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रपति बनाये जाने के पीछे कुछ न कुछ तथ्य जरुर है। इन सब से इतर सब से महत्व पूर्ण बात यह है कि वर्तमान में किस तरह के व्यक्ति को राष्ट्रपति के पद के योग्य माना जाये।

इस मुद्दे पर वैसे तो जनता की राय पूरी तरह बेमानी है क्योकि राष्ट्रपति के चुनाव में जनता का कोई सहयोग नही होता और उनके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि भी व्यक्तिगत निर्णय नही ले सकते हैं, क्योकि राष्ट्रपति का उम्मीदवार सामूहिक होता है और उसी से परिणाम निकलता है। इतिहास गवाह है कि सत्ता चलने का काम प्रधानमंत्री का ही रहा है फिर चाहे वह भारत का पूर्व प्रधान मंत्री चाणक्य (चन्द्र गुप्त का प्रधान मंत्री) रहा हो या फिर भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह।

पहले राजा था और अब राष्ट्र पति पर तब राजा ही सब कुछ था और आज राष्ट्रपति कागज पर सब कुछ है लेकिन व्यवहार में प्रधानमंत्री सब कुछ है। हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र की तरह ही राष्ट्रपति का कार्य है जो भीष्म पितामह पर आश्रित है। यानि उस समय भी भीष्म पितामह को एक राजनैतिक प्रष्ट भूमि वाले व्यक्ति के लिए काम करना था। अकबर के लिए बैरम खान था पर अकबर को सारी राजनैतिक दाव पेंच की जानकारी थी तभी तो वह बैरम खान के भी मंसूबो को जान सके। चन्द्र गुप्त खुद एक बेहतर सोच वाला राजनैतिक था तभी चाणक्य एक बेहतर राष्ट्र चला पाया।

एक कहावत है देवो भूत्वा देवो अजयेते, यानि देवता बन कर ही देवता को प्राप्त किया जा सकता है। और पीर भारत में तो परम्पर रही है कि जो जिस विषय में पारंगत है वह उसी में प्रवक्ता बन सकता है क्योकि यह यह मान्यता कि बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद या फिर इसे आप और बेहतर से यह कहकर समझ सकते है कि बन्दर के हाथ में उस्तरा।

लेखक परिचय- डा. अलोक चांटिया, अखिल भारतीय अधिकार संगठन के अध्‍यक्ष, श्री जयनारायण पीजी कॉलेज लखनऊ के शिक्षक एवं इग्‍नू के काउंसिलर हैं।

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