ज्यादा दिन नहीं चलने वाली अन्ना-रामदेव की दोस्ती
बेंगलूरु। दिल्ली के जंतर-मंतर पर बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के संयुक्त अनशन में सैंकड़ों लोगों ने हिस्सा लिया। सभी इसी आस में अनशन स्थल पहुंचे कि शायद उनकी इस पहल से देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाये। लेकिन योग गुरु के इस कार्यक्रम का माहौल कुछ और ही बयां कर रहा था। जी हां जिस समय अन्ना और रामदेव ने हाथ मिलाया था, उस समय देश को लगा था कि एक नई अलख जलने जा रही है, लेकिन दोनों के पहले ही संयुक्त कार्यक्रम ने सब कुछ उलट कर रख दिया। साफ शब्दों में कहें तो अन्ना-रामदेव की दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।

इस बात की गहराई में जाने से पहले हम आपको दो कार्यक्रमों की झलक दिखाना चाहते हैं। पहला बेंगलूरु के फ्रीडम पार्क की, जहां अन्ना के कार्यक्रम में सिर्फ भ्रष्टाचार विरोधी रंग दिखाई दिये। यहां हर रंग में लोग दिखाई दिये, हर मजहब के लोग दिखाई दिये। वे लोग जो खुद से चलकर अन्ना के कार्यक्रम में आये थे।
दूसरी झलक दिखाना चाहेंगे जंतर-मंतर पर गत रविवार को हुए कार्यक्रम की। जहां का प्रांगण पूरी तरह भगवा रंग में रंगा हुआ था, मानो रामायण का पाठ चल रहा हो। मुस्लिमों की बात करें तो महज कुछ खास लोग ही दिखाई दिये, जनता के बीच मुस्लिमों की संख्या न के बराबर थी। चारों तरफ साधू-संन्यासी दिखाई दे रहे थे।
हम यह नहीं कह रहे कि रामदेव के कार्यक्रम में मुस्लिम नहीं आये, बल्कि हम यह कहना चाहेंगे कि उनका कार्यक्रम राष्ट्रवादी से ज्यादा हिन्दूवादी प्रतीत हुआ। जंतर-मंतर पर बाबा का योग शिविर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आह्वान था, तो प्रांगण को भगवा रूप देने की क्या जरूरत थी। जितनी संख्या में साधू-संन्यासी आये उतनी संख्या में मुल्ला-मौलवी क्यों नहीं आये। अब अगर मंच पर जायें तो आधे से ज्यादा समय बाबा रामदेव माइक से चिपके रहे। अन्ना और टीम अन्ना के सदस्यों को बोलने का मौका उम्मीद से काफी कम मिला।
अगर दोनों की छवि की बात करें तो अन्ना की छवि गैर-राजनीतिक, गैर धार्मिक छवि है, जो सिर्फ एक एकता की भाषा जानती है। वहीं बाबा रामदेव में राजनीति का मोह और कहीं न कहीं हिन्दूवादी छवि दिखाई देती है। यह अच्छे संकेत हैं कि बाबा रामदेव ने हाल ही में कई मुस्लिम सभाओं में शिरकत की, लेकिन अगर उन्हें अपनी इस जंग में जीतना है, तो इस लड़ाई में हर धर्म के लोगों को बराबर से भागीदार बनाना होगा। यह बात ध्यान में रखनी होगी कि अभी हमारा देश पूरी तरह जातिवाद और धर्मवाद से ऊपर नहीं उठ पाया है। बाबा ने यदि ऐसा नहीं किया तो यह दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चलने वाली।












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