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गलती तो मां-बाप की थी फिर हत्‍या आरुषि की क्‍यों?

Aarushi Murder Case
अंकुर कुमार श्रीवास्‍तव

'आरुषि तलवार', चार सालों में यह नाम अब शायद ही किसी के लिये अपरिचित हो। उसके माता-पिता का भी नाम आज पूरा देश जानता है। आज फैसले की घड़ी नजदीक है और अटकलें तेज हैं। क्‍या तलवार दंपत्ति आरोपों से बरी हो जायेंगे या फिर अदालत उन्‍हें हत्‍या का दोषी मान लेगी? फैसला चाहें जो कुछ भी हो मगर जरुरत इस बात की है कि पूरे हत्‍याकांड के बहाने हर मां बाप आईने में अपना मुल्‍यांकन करें, आत्‍मावलोकन करें और अपने बच्‍चों के बीच के रिश्‍तों को पुनर्परिभाषित कर संवाद की स्थिति की पड़ताल करें।

सीबीआई ने कहा है कि आरुषि और हेमराज को आपत्तिजनक स्थिति में देखकर तलवार दंपत्ति ने उसका खून कर दिया। मगर इस बात की जांच बहुत जरुरी है कि आखिर किस वजह से ऐसे हालात पैदा हुए और मासूम आरुषि के रास्‍ते बदल गये? आखिर कौन सी ऐसी स्थिति पैदा हुई कि आरुषि अपनों से दूर होकर परायों के करीब पहुंच गई? सवाल यह भी है कि कच्‍ची उम्र में जब आरुषि को सबसे ज्‍यादा एक साथी और एक सही मार्गदर्शक की आवश्‍यक्‍ता थी तो मां नुपुर तलवार उसके साथ क्‍यों नहीं थीं?

अगर यह तथ्‍य सच है कि आरुषि और हेमराज को विस्‍तर पर देख मां बाप बौखला गये और हत्‍या कर दी तो भी क्‍या दोषी सिर्फ आरुषि ही है? क्या दोष उसके जीवन में पसरे एकांत का, उसकी अजनबी कोमल भावनाओं के उफान पर समझदार नियंत्रण के अभाव का नहीं है? आखिर कैसे कोई पैसे की लालच में इतना लापरवाह और अंधा हो सकता है कि अपनी ही संतान को दूसरों के भरोसे छोड़कर उससे नैतिक व अनुशासित बने रहने की उम्मीद भी करें और भटकने की दशा में हत्‍या ही कर डालें?

फैसले से पहले आरुषि हत्‍याकांड में सिर्फ सवाल ही सवाल हैं जिनका जवाब ढूंढना बेहद ही जरुरी है क्‍योंकि आज घर में में एक नन्‍हीं, नादान और मासूम आरुषि है। सवाल यह है कि हम असुरक्षा के किस युग में जी रहे हैं कि हमारे ही घरों में हम खुद अपने बच्‍चों की देखभाल नहीं कर स‍कते और हमारी संतान हमारे घर में प्‍यार और अपनत्‍व के लिये छटपटायें? बच्‍चों को दंडित करने का हक मां बाप को सिर्फ इसलिये नहीं मिल जाता है कि वे उसके जन्‍मदाता हैं। बल्कि यह हक उन्‍हें इसलिये मिलता है कि जबतक बच्‍चा भले बुरे में अंतर ना समझ जाये उसे समझाएं और सही मार्ग दिखायें।

फिर तलवार दंपत्ति यह क्‍यों भूल गये कि आरुषि के बचपन को सहेजने की जिम्‍मेदारी उनकी थी। अगर वो इस जिम्‍मेदारी में नाकाम हुए तो कत्‍ल आरुषि का क्‍यों? दंड की हकदार तो उसकी परवरिश है। जब वह अपने परवरिश करने का हक नहीं निभा पाये तो आरुषि को सजा देने का भी हक उनको नहीं था। हम आज कटघरे में फैसले की दहलीज पर खड़े है और अनगिनत सवालों के चेहरे आरुषि के खुबसूरत चेहरे को धुंधला कर रहे हैं। ऐसी दहलीज पर मां बाप से सिर्फ एक ही गुजारिश है कि वह इस बात पर ध्‍यान दें कि उनके घर में कोई बचपन दूर तो नहीं हो रहा या फिर हो सकता है कि किसी और के नजदीक जा रहा हो। गुज‍ारिश यह भी है कि सही समय पर थाम लें बचपन से किशोर होती आने वाली सुहानी पीढ़ी को।

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