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शायद हम कभी नहीं समझेंगे मजदूर के पसीने की कीमत

Labour Day
डा. आलोक चांटिया

आज मजदूर दिवस है और यह अपने आप में कितनी आश्चर्य जनक बात है कि मानव सभ्यता की इतनी लम्बी यात्रा के बाद भी मानव की एक श्रेणी ऐसी है, जिसे हम मजदूर कहते हैं। वैसे तो ऋगवेद के पुरुष सूक्त के दसवे मंडल के अनुसार जो शारीरिक श्रम करने वाला होता है वही शूद्र कहलाता है। तो उसके प्रकाश में आज शुद्रो की संख्या ही बढ़ी है। पर ऐसा क्या है कि मानव जीवन की महत्ता बताने वाले हर धर्म अपने शूद्रों को बनाये रखना चाहते है?

क्या हम सुख पाने के लिए आज भी ऐसी मानव फ़ौज चाहते हैं, जो उतने सुख में ना रहे जितने में हम रहते हैं? जब मानव जीवन नश्वर है और बड़ी मुश्किल से मिलता है तो हम क्यों नही चाहते कि हर मनुष्य को इस बात का सुख और आनंद मिले कि उसे मानव जीवन मिला है? हम क्यों कहते हैं कि यह सब कर्मों का खेल है और इसी लिए मजदूर को नरक सा जीवन मिला है और उसे यह सब भोगना ही पड़ेगा। अगर यह दर्शन सत्य है तो फिर हममे से कोई क्यों अपने दर्द के लिए डॉक्टर, मंदिर, साधू, फकीर के पास दौड़ता है।

इससे साफ जाहिर है कि वह मानता है कि कुछ भी प्रयास से बदला जा सकता है, तो क्या मानव झूठ का सहारा लेकर अपने दायित्वों से बचना चाहता है? या फिर उसे गुलाम चाहिए और मानवाधिकार के आईने में यह अब संभव नहीं है तो अभावों में रहने वाले ऐसे मनुष्यों को हमने जिन्दा रखा जिनको हम अपने सुख के लिए प्रयोग करते हैं।

हर देश का कानून, संविधान और खुद लोग (समृद्ध) यह कह कर बच निकलते हैं कि वे (मजदूर) अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं, कोई उन पर जबरदस्ती नही कर रहा है। इस लिए कोई कार्यवाही बनती ही नहीं है। एक सामान्य मनुष्य गर्मी में इतना पागल हो उठता है कि वह पैदल चलने कि सोच ही नहीं पाता और एक उसी के समान मनुष्य उतनी ही गर्मी में आपको रिक्शा में लेकर ढोता है और पसीने से लत पथ उस मनुष्य से हम अपने गंतव्य पर पहुंच कर यह भी नही पूछते कि भैया क्या प्यास तो नही लगी है। क्योकि आपके लिए तो यह उसके कर्म है जो वह भोग रहा है?

कभी सोचा कि अगर सब भगवन को ही देना था तो उसने आरम्भ ( 60 लाख साल पहले जब पहली बार मनुष्य के साक्ष्य पृथ्वी पर मिले) के मनुष्य को नंगा, भूखा, बिना घर के क्यों रखा? क्या इस लिए कि उन सब के कर्म में यह लिखा था और आज से 10,000 साल पहले तक वह ऐसे ही रहा या फिर वह कर्म का पुजारी आपके लिए संस्कृति की वह दीवार बना रहा था जिस पर आज आप हम और ऐश कर रहे हैं।

उन्ही मनुष्यों के अवशेष है यह मजदूर कहे जाने वाले मनुष्य जिनका सम्मान हम सबको इस लिए करना चाहिए क्योकि मानव संस्कृति के देवता है ये सब जो पाने को गला कर खेतो में आनाज उगाते हैं। तपती धूप में आपका घर बनाते हैं। और इसी लिए मंदिर नहीं, मस्जिद नहीं, गुरु द्वारा नहीं, गिरजा घर नही, मंदिर के देवताओं को अपने इर्द गिर्द खोजिये और उन्हें एक गिलास ठंडा पानी ही पिला दीजिये। क्योंकि भगवन तो प्रेम का भूखा है और इतना पाकर भी तृप्त हो जायेगा और समझ लेगा की अभी पृथ्वी पर उसके अवशेष में मानव शेष है।

मजदूर भाई बहनों का शत-शत अभिनंदन। आज अखिल भारतीय अधिकार संगठन ने राज्य सभा में एक याचिका प्रस्तुत करके मजदूरो के बेहतर जीवन के लिए वकालत की है जो आने वाले समय में उनके लिए मील का पत्थर साबित होगी। हे पृथ्वी के श्रम देवी-देवता मेरा प्रणाम स्वीकार करो।

लेखक परिचय- डॉ. आलोक चांटिया, अखिल भारतीय अधिकार संगठन के अध्‍यक्ष हैं। साथ ही वे श्री जयनारायण पीजी कॉलेज, लखनऊ के प्रवक्‍ता व इंदिरा गांधी मुक्‍त विश्‍वविद्यालय के काउंसिलर हैं।

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