एक थाना ऐसा भी जहां न पुलिस है न सिपाही

प्रदेश भर में महिला उत्पीडऩ के मामलों पर काबू पाने की गरज से चार साल पहले एक महिला थाने की स्थापना की गई थी। स्थापना से पूर्व इन थानों में जनपद की महिला आबादी के आधार पर महिला पुलिसकर्मी, असलहा व वाहन का खाका तैयार कर संसाधन स्वीकृत किए गए थे, लेकिन शासनने इसे पूरा करने की जरूरत नहीं समझी। लिहाजा दस्तावेजों में ये थाने तो संचालित हैं, मगर हकीकत कुछ और है।
बानगी के तौर पर बांदा में पुलिस आला अफसरानों की नाक के नीचे चल रहे महिला थाने को देखा जा सकता है, जहां शस्त्रागार तो बना है लेकिन एक भी असलहा नहीं है। वाहन खड़ा करने के लिए गैराज भी है, मगर पुलिस जीप नहीं है। इस थाने में अब तक किसी थानेदार तक की तैनाती नहीं हो सकी। केवल दो महिला सिपाही तैनात हैं जो बारी-बारी (दिन और रात) हाजिरी देने थाने पहुंचती हैं।
ऐसा भी नहीं है कि जनपद में महिला उत्पीडऩ के मामलों में विराम लगा हो। आए दिन महिलाएं घरेलू व बाहरी हिंसा की शिकार हो रही हैं और फरियादी को महिला थाने में स्टाफ व संसाधन की कमी बताकर इलाकाई थानों में टरका दिया जाता है। यही कारण है कि कर्मचारी और संसाधन की कमी की वजह से चार साल में महिलाओं से जुड़ा एक भी मामला इस थाने में नहीं दर्ज किया जा सका।












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