माओवादियों ने विधायक को किया 'प्रजा अदालत' में पेश

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भुवनेश्वर। ओडिशा की सत्ताधारी पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) के अगवा विधायक झिना हिकाका को माओवादियों ने आज प्रजा अदालत में पेश किया ताकि उनकी किस्मत पर फैसला हो सके। माओवादियों ने ऐसे वक्त में हिकाका को प्रजा अदालत में पेश किया है जब राज्य सरकार ने कल ही यह घोषणा की थी कि विधायक की रिहाई के एवज में वह 13 कैदियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस ले लेगी।

अदालत में माओवादियों के मुकदमों की पैरवी करने वाले वकील निहार रंजन पटनायक ने बताया कि आंध्र-ओडिशा सीमा विशेष क्षेत्रीय समिति के माओवादियों की ओर से जैसा पहले कहा गया था उसके मुताबिक प्रजा अदालत ने कोरापुट जिले के नारायणपटना इलाके के एक सुदूर स्थान पर अपनी कार्यवाही शुरू कर दी है।

ओडिशा के मुख्‍यमंत्री नवीन पटनायक ने यह कहते हुए इस बात की तस्दीक की कि लक्ष्मीपुर विधान सभा क्षेत्र से 37 वर्षीय विधायक को प्रजा अदालत में पेश किया गया है कि कार्यवाही जारी है और ज्यादातर आदिवासियों सहित कई लोगों को अपना बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया गया है। हालांकि, पटनायक को इस बात का अंदाजा नहीं है कि प्रजा अदालत की कार्यवाही कब तक चलेगी और विधायक के भाज्ञ के बाबत क्या निर्णय आएगा।

गौरतलब है कि माओवादियों की ओर से प्रजा अदालत की कार्यवाही तब शुरू की गयी है जब उनकी मांगों को मानने के लिए दी गयी अंतिम समयसीमा कल शाम पांच बजे खत्म हो गयी। माओवादियों ने एक संदेश के जरिए कहा था कि विधायक की किस्मत का फैसला इस प्रक्रिया से होगा। माओवादियों की मांग के आगे झुकते हुए राज्य सरकार ने भी घोषणा की थी कि वह 13 कैदियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के लिए तैयार है।

जिन 13 लोगों के खिलाफ सरकार मामला वापस लेने के लिए तैयार हुई उनमें से पांच माओवादी हैं । बीते 24 मार्च को माओवादियों की ओर से अगवा कर लिए गए विधायक झिना हिकाका की रिहाई के एवज में सरकार को माओवादियों की मांग मानने पर विवश होना पड़ा है।

दूसरी तरफ उच्चतम न्यायालय ने बंधक बनाए गए बीजू जनता दल (बीजद) के विधायक झिना हिकाका को छुड़ाने के बदले जेल से माओवादियों की रिहाई पर रोक लगाने की मांग करने वाली एक याचिका पर आज केंद्र और ओडि़शा सरकार से जवाब मांगा। न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने प्रतिवादियों को दो सप्ताह के अंदर जवाब दाखिल करने को कहा।

प्रारंभ में शीर्ष अदालत ने कोई नोटिस जारी करने से अनिच्छा जतायी लेकिन जब मेजर जनरल (सेवानिवृत) गांगुरदेप बख्शी ने अपने आग्रह को लेकर दबाव बनाया तब वह मान गयी। याचिकाकर्ता ने कहा कि अपहृत विधायक की रिहाई का रास्ता सुगम बनाने के लिए राज्य सरकार पहले ही पांच माओवादियों को रिहा कर चुकी है।

सवालों का जवाब देते हुए (बख्शी के) वकील ने कहा कि माओवादियों की रिहाई के लिए जमानत अर्जी उनके समर्थकों द्वारा दायर की गयी है और राज्य सरकार ने उसका विरोध नहीं करने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि पूरी कवायद सरकार और माओवादियों के बीच साठगांठ का हिस्सा है।

न्यायालय ने कहा कि इस चरण में यदि ऐसा है तो हमारे हस्तक्षेप की गुजाइंश बहुत सीमित है। लेकिन आप मजिस्ट्रेट की अदालत में जा सकते हैं और चुनौती दे सकते हैं। हालांकि (बख्शी के) वकील ने इस बात पर बल दिया कि इस मुद्दे पर कम से कम राज्य और केंद्र को नोटिस तो भेजा जाए, जिसके बाद शीर्ष अदालत मान गयी।

अदालत में मौजूद सॉलीसिटर जनरल रोहिनटन एफ नरीमन ने कहा कि माओवादियों के उग्रवाद से निबटने के लिए कानून बनाने संबंधी याचिकाकर्ता का अनुरोध एक वृहत मुद्दा है और अतएव वह मौजूदा संकट के लिए प्रासंगिक नहीं है। हालांकि पीठ ने कहा कि चूंकि केंद्र एक प्रासंगिक पार्टी है, ऐसे में वह केंद्र सरकार और ओडि़शा सरकार दोनों को ही नोटिस जारी करना चाहेगी।

उल्लेखनीय है कि 24 मार्च को कोरापुट जिले से हिकाका का अपहरण कर लिया गया था। वह एक राजनीतिक बैठक से लौट रहे थे। आतंकवाद निरोधक अभियान विशेषज्ञ बख्शी ने शीर्ष अदालत से कहा कि राज्य सरकार को माओवादियों को रिहा करने से रोका जाना चाहिए क्योंकि सुरक्षाबलों ने अपनी जान की बाजी लगाकर इन माओवादियों को पकड़ा था। उन्होंने कहा कि उनकी याचिका पर तत्काल सुनवाई की जाए क्योंकि माओवादियों द्वारा तय समय सीमा कल शाम पांच बजे ही खत्म होने वाली थी।

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