अखिलेश, अखिलेश, अखिलेश, अखिलेश, और सिर्फ अखिलेश!
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने इस बार जो सरप्राइज दिया है वह शायद ही उसे अवाम भूल सके। पर सबसे चौकाने वाले परिणाम यूपी में आए जहां बसपा के पांच साल के शासन को लोगों ने ठुकराते हुए एक नए नवेले, बिना अनुभवी और आस्ट्रेलिया से शिक्षा प्राप्त युवक को कमान सौंपी जिसे केवल औऱ केवल अखिलेश के नाम से जाना जाता है। शायद बेइमान राजनीतिज्ञों में यूपी के लोगों को एक सीधा साधा सज्जन नजर आया जिसे सत्ता सौंप कर वे निश्चिंत होना चाहते हैं और हरतरफ गाना चाहते हैं अखिलेश!!! अखिलेश!!! अखिलेश!!! अखिलेश!!! व सिर्फ अखिलेश!!!.....
उत्तर प्रदेश में यह एक नई प्रवृत्ति है। इससे सपा को चौकन्ना रहना होगा और सुशासन व विकास के प्रति जनता की उम्मीद पर खरा उतरना होगा। यही नहीं, सपा को जनता के उस विश्वास को भी कायम रखना होगा जिसमें जनता ने सपा की इस बात पर भरोसा किया है कि पिछली बार की गुंडागर्दी नहीं दोहराई जाएगी। जनता की लोकतंत्र में प्रतिबद्धता का एकदम नया स्वरूप दिखाई दे रहा है, जिसमें वह राजनीतिक दलों के लिए एक परीक्षक की भूमिका का निर्वहन कर रही है।
बड़ा सवाल यह है कि बसपा की हार क्यों हुई? इसका उत्तर बहुत कठिन नहीं है। मायावती सरकार कुशासन और भ्रष्टाचार को एक नए स्तर पर ले गई और ऐसी बातें जनता से छिपती नहीं हैं। इसके अलावा बसपा सोशल इंजीनियरिंग और समावेशी राजनीति के अंतर्विरोधों को भी नहीं सुलझा पाई। ब्राह्मणों के आगमन से दलितों का जो विस्थापन हुआ और उससे उनमें जो पीड़ा उभरी उसकी कोई भरपाई नहीं हो पाई। एक सर्वे के मुताबिक बसपा से न केवल दलितों का हर क्षेत्र में मोहभंग हुआ है, वरन उसका पक्का वोट बैंक भी उससे नाराज हो गया। ब्राह्मण छिटका तो नहीं, लेकिन और ज्यादा ब्राह्मण जुड़े नहीं। बसपा को कुशवाहा फैक्टर का भी नुकसान हुआ और अति-पिछड़ा वर्ग के लगभग नौ प्रतिशत मतदाता बसपा से दूर चले गए।
सपा को इतनी अधिक सफलता मिलने का केवल यही कारण नहीं हो सकता कि बसपा के विरुद्ध ‘सत्ता-विरोधी रुझान’ रहा। इसका यह प्रमुख कारण रहा कि जिस समावेशी राजनीति की शुरुआत 2007 में बसपा ने की उसे 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने भुनाया और इस बार के चुनावों में सपा ने। अर्थात, समाज की सभी जातियों और वर्गों में सपा को वैसा ही समर्थन मिला है, जैसा कांग्रेस को 2009 और बसपा को 2007 में मिला था। सपा के लिए महत्वपूर्ण बात है कि कांग्रेस द्वारा अल्पसंख्यकों को 4.5 प्रतिशत आरक्षण देने का वायदा करने के बावजूद उसे मुस्लिम समाज का विश्वास प्राप्त हुआ और छोटे-छोटे दल जैसे पीस पार्टी, कौमी एकता दल, अपना दल या महान पार्टी आदि उसका मुस्लिम वोट या पिछड़ा वोट काटने में सफल नहीं रहे।
इन चुनावों में एक और भी बात उभर कर आई है। वह है अन्ना फैक्टर। मतदाताओं का अधिक निकलना और संभवत: एक मन बनाना कि हमें उन दलों को वोट नहीं देना है जो भ्रष्ट हैं, कांग्रेस और बसपा परभारी पड़ा। कमोबेश भाजपा पर भी यह लागू होता है। कुशवाहा को लेना भाजपा के लिए एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ बन गया, क्योंकि भ्रष्टाचार का ठप्पा उस पर भी चस्पा हो गया। अन्यथा भाजपा शायद उन युवाओं को आकृष्ट करती जो किसी विकल्प के अभाव में सपा की ओर चले गए।













Click it and Unblock the Notifications