नरेंद्र मोदी के खिलाफ क्‍यों बुलंद होते हैं मीडिया के सुर

Narendra Modi
2. हिंसा को रोकने के लिए गुजरात सरकार द्वारा उठाये गये कदम कभी मीडिया में नहीं दिखाये गये। वास्‍तव में मीडिया द्वारा "परिचर्चा" (जिसे नौटंकी करार दिया गया) में कुछ और ही दिखाने के प्रयास किये जा रहे थे। चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के नाते मैं हमेशा से अवमूल्‍यन के बारे में सोचता हूं। लेकिन व्‍यक्ति की बात करें तो अवमूल्‍यन समय के साथ कम होने वाले मूल्‍य हैं। दुर्भाग्‍यवश नरेंद्र मोदी किसी अवमूल्‍यन से नहीं गुजरे। सबसे महत्‍वपूर्ण यह है कि नरेंद्र मोदी को नुकसान पहुंचाने के लिए गंदे खेल खेले जा रहे हैं।

3. 2002 के बाद मीडिया ने नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने के लिए कई प्रयास किये। इसी बीच एक व्‍यक्ति ने एक नफरत से भरा ई-मेल नरेंद्र मोदी को भेजा, उसके बावजूद मोदी ने उसे माफ कर दिया। वैसे ज्‍यादातर लोग जो इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया पर निर्भर रहते हैं वो नहीं जानते होंगे, क्‍योंकि उन्‍हें वहां दबा दिया गया। (“नफरत का ई-मेल भेजने वाला एक संप्रदायिक व्‍यक्ति, तो क्‍या? वो उनके खिलाफ भौंकता रहेगा)। अब अगर इसकी तुलना विक्रम बुद्धि के मामले से करें, जिसने जॉर्ज बुश को नफरत भरा मेल भेजा था। तब मीडिया द्वारा इस्‍तेमाल किये जाने वाले मोदी-विरोधी शब्‍द ईमानदारी जैसे लगेंगे, जैसा कि मीडिया हमारे दिमाग पर थोपना भी चाहता है।

4. एक और उदाहरण यहां देना चाहूंगा। 2002 के बाद मीडिया छतों पर खड़े होकर चिल्‍ला रहा था कि पूरा गुजरात जल रहा है। 2002 के बाद जब तक चुनाव खत्‍म नहीं हो गये, तब तक चैनल ऐसे ही चिल्‍लाते रहे। मीडिया ने कहा कि नरेंद्र मोदी सिर्फ दंगा-प्रभावी इलाकों से सीट मिलेंगी तभी जीत सकेंगे। आज अंतर देखिये पूरे गुजरात में सब मोदी के समर्थन में हैं। वास्‍तव में भाजपा को मध्‍य गुजरात से 10 से 12 सीटें ज्‍यादा मिलीं। आज भाजपा 110 सीटों से ज्‍यादा सीटों के साथ बहुमत के साथ शासन कर रही है। (यहां बताने की जरूरत नहीं है कि किस सांप्रदायिक मीडिया ने 'पूरे गुजरात' और 'दंगा-प्रभावित गुजरात' की कहानी लिखी।)

5. चूंकि सांप्रदायिक मीडिया ने नरेंद्र मोदी पर निशाना साध ही लिया था, इसलिए छोटे-छोटे मुद्दे जिनकी कोई प्रासंगिकता नहीं है, उन्‍हें भी इस तरह उछाला गया, जैसे मोदी ने कोई अपराध किया हो। हम याद करना चाहेंगे जब पीएसयू जीएसपीसी ने कृष्‍णा-गोदावरी बेसिन में भारी मात्रा में गैस पायी थी। तब भी मीडिया ने नरेंद्र मोदी पर उंगली उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह वो मुद्दा था जिसका कोई महत्‍व नहीं था, फिर भी मीडिया ने अपने तीर चलाये।

6. आम आदमी को देखें तो आम आदमी से लेकर औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले निष्‍ठावान नरेंद्र मोदी की तारीफ कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर दो मुख्‍य मुस्लिम बिजनेसमैन अजीम प्रेमजी और गुलाम नून सकारात्‍मक दृष्टिकोण के साथ नरेंद्र मोदी से मिले। लेकिन इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने उसे बहुत कम तरजीह दी। यहां तक गुलाम नून ने मोदी की सराहना की थी।

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