बीमार यूपी के इलाज के लिए 'चुनावी टैबलेट'
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में करीब साढ़े बारह करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। मतदाता सूची के पुनरीक्षण के बाद प्रदेश में लगभग एक करोड़ उनतालीस लाख नये मतदाता शामिल हुए हैं जो तय करेंगे राजनीतिज्ञों का भविष्य, पार्टियों की दशा और प्रदेश की सरकार। हालांकि चुनावी महासंग्राम में हर राजनीतिक दल ने यह भांप लिया है कि इस बार चुनावी वैतरणी में युवा मतदाता ही उनकी नैय्या पार लगायेंगे तभी तो पार्टी की घोषणा-पत्र से लेकर चुनावी मंच तक से युवाओं को रिझाने के लिए कई घोषणाएं की जा रही है।
भाजपा देगी ‘टेबलेट’, सपा देगी ‘टेबलेट’ और कांग्रेस दावा कर रही है कि ‘टेबलेट’ यानि कम्प्यूटर तो हमारी ही देन है। ऐसे में याद आता है मेरे एक डाक्टर मित्र के ‘टेबलेट’ का हिस्सा। उत्तर प्रदेश सरकार के अधीनस्थ कार्यरत मेरे एक डाक्टर मित्र ने एक दिन अपनी टेबलेट से परेशानी का जो सबब बताया वो राजनीतिक पार्टियों के टेबलेट से दूर होने वाला नहीं है।
ग्रामीण अंचल के सीएचसी पर तैनात डाक्टर मित्र ने बताया कि अस्पताल में तीन टेबलेट की सप्लाई आती है। एक पारासिटामोल, दूसरा ब्रूफेन और तीसरा पेरिनाम। बीमारी चाहे जो भी हो इलाज के लिए यही तीन ‘टेबलेट’ देना पड़ता है।
स्थिति तब असहाय हो जाती है जब एक ही परिवार के तीन मरीज अलग-अलग मर्ज लेकर आते हैं और उन्हें देवा एक ही प्रकार की देनी पड़ती है। डाक्टर साहब कहते हैं मेरी मजबूरी देखें... मरीज को बाहर से दवा खरीदने की सलाह नहीं दे सकता... शिकायत हो जाएगी और सीएचसी पर दवा उपलब्ध नहीं। इसी तीन ‘टेबलेट’ के सहारे चल रहा है प्रदेश का पूरा स्वास्थ्य महकमा। परंतु सच्चाई कुछ और बयां कर रही है। विभाग में कागजों पर हजारों करोड़ की दवाएं खरीदी गई है। ‘टेबलेट’ तो दस गुने दाम पर खरीदी गई है। तभी सीबीआई ने भी माना है कि एनआरएचएम यानि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत कई हजार करोड़ रुपए के बजट में जमकर बंदरबांट हुई है।
जांच के दौरान अब इसके साक्ष्य मिलने लगे हैं और नेताओं और अफसरों का शिकंजा कसने लगा है। प्रदेश के कई राजनीतिज्ञ और आला अफसर कार्यवाई की डर से ‘टेबलेट’ खाने लगे हैं। विडंबना देखिए ... जनता को जिस ‘टेबलेट’ की जरूरत है उसके बारे में कोई दल सुध नहीं ले रहा है और ऐसे ‘टेबलेट’ को देने की घोषणा की जा रही है जिसको चलाने के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है और प्रदेश में बिजली का आलम यहां की जनता से ज्यादा कौन जानता है।
डाक्टर मित्र के ‘टेबलेट’ किस्से सुनकर कांग्रेस महासचिव का बयान कि केंद्र सरकार का पैसा उत्तर प्रदेश में हाथी खा जाता है, सोचने पर मजबूर करता है कि इसमें थोड़ी सच्चाई तो है पर जब समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के बयान ... ‘प्रदेश के हाथी को केंद्र का हाथ पैसा खिला रहा है तो इसे भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ये सब महज सियासी बयानबाजी है हकीकत में तो जनता का पैसा सब मिल बांट खा रहे हैं और उत्तर प्रदेश की जनता दिन-ब-दिन पिछड़ती जा रही है।
यही बात प्रियंका वाड्रा ने भी अपनी चुनावी सभाओं में दोहराई है। ‘बाईस साल में पिछड़ गया है यूपी, कब तक सहेंगे’। यही सच है प्रदेश की जनता भी इससे निजात पाना चाहती है इसलिए अन्ना हजारे के आंदोलन को जो जनसमर्थन उत्तर प्रदेश से मिला था उसने यह संकेत दे दिया था कि अब यहां की जनता जाग उठी है और वो अब अपने मत का सही उपयोग कर उत्तर प्रदेश की दशा और दिशा बदलने के लिए तैयार है न कि राजनीतिक पार्टियों के ‘टेबलेट’ खाने के लिए। क्योंकि राजनीतिज्ञों के सामने भी जनता के हर मर्ज के इलाज के लिए सिर्फ आश्वासन का ‘टेबलेट’ ही उपलब्ध है।
लेखक परिचय- राजेश अनंद, लखनऊ से निकलने वाली राष्ट्रीय मासिक पत्रिका एराउंड दि इंडिया (एटीआई) के संपादक हैं।













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