बेटे का दर्द नहीं देख पा रही मां, की इच्‍छा मृत्‍यु की मांग

Mercy Killing
चित्‍तोड़। वो मां जो खुद दर्द सहकर हमें खुशी देती है। वो मां जो अपनी आंखों में आंसू लेकर भी हमारे चेहरे पर मुस्‍कान देखना चाहती है। दुनिया की हर मां ऐसी ही होती है। जो अपने बच्‍चे को कभी दुख में नहीं देख सकती और अपने बच्‍चे की लंबी उम्र की हमेशा दुआ करती है। क्‍या आप कभी सोच सकते हैं कि एक ऐसी मजबूर मां भी है जो अपने बेटे के लिए मौत मांग रही है।

वो मां अपने बेटे के दर्द से इतना वि‍चलित हो चुकी है कि उसने कोर्ट से अपने बेटे के लिए इच्‍छा मृत्‍यु की मांग की है। यह मामला चित्‍तोड़ के जिला न्‍यायालय में सामने आया है। जहां 61 वर्षीय एक महिला ने अपने 36 वर्षीय बेटे सी जनार्दन के लिए इच्‍छा मृत्‍यु की मांग की है जो पिछले 15 साल से जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। एक हादसे की वजह से उसके शरीर के कई हिस्‍सों ने काम करना बंद कर दिया है।

इस समय जनार्दन की देखभाल उसकी मां लक्ष्‍मम्‍मा अपने घर में कर रही हैं। उसकी मां का कहना है कि उसके बेटे का जनार्दन का एक्‍सीडेंट 5 मई 1997 को हुआ था। जब वह वीजा लेने के लिए बेंगलूरू जा रहा था। जनार्दन की ऑस्‍ट्रेलिया की एक कंपनी में एयरोनॉटिकल इंजीनियर के तौर पर नौकरी लगी थी। हादसे के बाद 5 साल तक वह कोमा में रहा। उसके बाद भी वह सही नहीं हो पाया है।

अपनी दर्दनाक अपील में महिला ने कहा है कि मुझे नहीं पता है कि मेरे बाद मेरे बेटे का ख्‍याल कौन रखेगा। उसका कहना है कि उसके पति की मृत्‍यु 8 साल पहले हो गई थी क्‍योंकि वह जनार्दन की लंबी बीमारी की वजह से बहुत परेशान थे। इस हादसे की वजह से ही उनकी मौत हो गई थी। जिला जज ने इस केस को 3 मार्च तक के लिए टाल दिया है।

महिला का कहना है कि उसकी विधवा पेंशन मात्र 500 रुपए है जो उसके बेटे के इलाज के लिए बहुत कम पड़ती है। उसका कहना है कि कैसे उसके गरीब पति ने बेटे के इलाज के लिए एक एकड़ जमीन बेच दी थी।

महिला का कहना है कि उसका पैरालिसिस होने की वजह से न तो बोल सकता है और न ही उसके हाथ व पैर काम करते हैं। महिला ने अपनी अपील में कहा है कि वह बहुत मुश्किल से अपने बेटे का ख्‍याल रख पा रही है। ऐसे में मुझे अपने बेटे के भविष्‍य की चिंता है।

हालांकि जज का कहना है कि केवल पैसों की कमी के आधार पर ही किसी को जीवन खत्‍म करने की इजाजत नहीं दी जा सकती है। जज का कहना है कि इस मांग को नहीं स्‍वीकारा जा सकता है। किसी को भी जीवन खत्‍म करने का अधिकार नहीं है। हमारा समाज अभी भी इच्‍छा मृत्‍यु को स्‍वीकार करने की स्थिति में नहीं है क्‍योंकि इसके हानिकारक दुष्‍प्रभाव हो सकते हैं।

जज ने पीडि़त को इलाज की सुविधा मुहैया कराने के लिए जिला जज और जिला अस्‍पताल के अधिकारियों को नोटिस भेजा है। इस मामले की अगली सुनवाई 3 मार्च को होनी है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जीवन का अधिकार हमारा मौलिक अधिकार है। संविधान के अनुच्‍छेद 21 के तहत किसी भी इंसान को अपने जीवन के अधिकारों से दूर नहीं रखा जा सकता।

मनोचिकित्‍सकों के अनुसार इच्‍छा मृत्‍यु का मामला काफी जटिल है। क्षमा और मृत्‍यु एक साथ नहीं आ सकते हैं। कानून भाषा में इसे मर्सी किलिंग का नाम दिया गया है। फिलहाल इस मामले से उस मां का अपने बेटे के लिए दर्द जरूर सामने आ रहा है।

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