खुद ही वोट नहीं डालते वोट डलवाने वाले
परिणाम के लिये वर्ष 2007 विस चुनाव के कर्मचारी मतदान आंकड़े जब सामने आए तो सहसा यकिन नहीं हुआ कि सरकारी मुलाजिम ही सरकार बनाने में दिलचस्पी नहीं लेते। आपको बताते चलें कि प्रदेश में चुनाव ड्यूटी में लगने वाले सरकारी कर्मचारियों की संख्या लाखों में होती है। कई बार कर्मचारी नेता इस बात का दावा करते हैं कि वह सरकार बनाने और बिगाड़ने की कूव्वत रखते हैं। मगर वास्तविकता इससे कोसो दूर है। वर्ष 2007 विस चुनाव में ड्यूटी पर लगे कर्मचारियों को मतदान का ब्यौरा देखा गया तो कर्मचारी नेताओं के सारे दाचे बेदम निकले।
बरेली, बस्ती और रायबरेली को ही ले तो यहां हजारों की तादात में कर्मचारी तैनात थे, लेकिन किसी ने भी मतदान नहीं किया। मुरादाबाद में 15 हजार से अधिक लोगों की चुनाव ड्यूटी थी, लेकिन मतदान सिर्फ कुछ सौ कर्मचारियों ने ही किया। पूर्वाचल के प्रमुख जिले गोरखपुर में 14 हजार कर्मचारियों की मतदान कराने में ड्यूटी लगी थी, लेकिन उनके मतदान का प्रतिशत काफी खराब रहा। यही हाल सिद्धार्थनगर जिले का भी रहा। दोनों ही जिलों में दो से ढाई सौ के बीच ही मतदान का आंकड़ा रहा। संतकबीर नगर जिले में पांच हजार से अधिक कर्मचारी लगे।
इनमें से सिर्फ 13 सौ कर्मचारी मतदान कर सके। देवरिया जिले में साढ़े दस हजार कर्मचारियों ने चुनाव ड्यूटी की, लेकिन मतदान करीब चार हजार ने ही किया। इसी तरह महराजगंज, आगरा, जालौन, अलीगढ़, बांदा, फर्रूखाबाद, कानपुर और फतेहपुर का रिकार्ड काफी खराब रहा। इलाहाबाद बड़ा केंद्र होने के बाद भी मतदान के आंकड़ों की नजर से कुछ बेहतर नहीं कर सका।
अपवाद रहा है लखनऊ
कर्मचारियों के मतदान मामले में लखनऊ अन्य जिलों के लिए रोल माडल के रूप में सामने आया है। 2007 के विधानसभा चुनाव में जिले में करीब 19500 कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई थी। इनमें से करीब 15800 कर्मचारियों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। यह प्रतिशत अन्य जिलों के मुकाबले में कहीं अधिक बेहतर रहा।













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