ग्रुप सी और डी के कर्मचारियों से ही शुरू होता है भ्रष्टाचार

सरकार ने बड़ी ही आसानी से कह दिया कि ग्रुप सी और ग्रुप डी के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल में शामिल नहीं किया जायेगा। देश के एक आम नागरिक के रूप में मुझे तो यही समझ आया है कि सरकारी लोकपाल बिल बनाने वाले लोग शायद अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने आरटीओ कभी नहीं गये। अपने मकान की रजिस्ट्री कराने, नये गैस कनेक्शन की बुकिंग, हथियार लाइसेंस, वाहन की एनओसी, नगर निगम, जल निगम, बिजली विभाग, हाउसिंग बोर्ड, आदि से लेकर पुलिस विभाग तक हर जगह भ्रष्टाचार की शुरुआत ग्रुप सी और डी के कर्मचारियों से ही होती है। हमने सबसे पहले आरटीओ कार्यालय का नाम इसलिए लिया, क्योंकि मैंने आज तक लखनऊ, बाराबंकी से लेकर बेंगलुरु तक एक भी आरटीओ कार्यालय नहीं देगा, जहां दलालों का बोलाबा नहीं हो।
खास बात यह है कि ग्रुप सी और डी को लोकपाल के दायरे में लाने से जहां एक तरफ देश के लाखों कर्मचारियों की आय के साधन कम हो जायेंगे, वहीं लाखों दलालों की दुकानें बंद हो जायेंगी। यह बात सरकार अच्छी तरह जानती है। अगर इसका चुनावी पक्ष देखा जाये तो सरकारी कर्मचारी से कोई भी राजनीतिक पार्टी पंगा नहीं लेना चाहती। हर पार्टी जानती है कि उसका वोटबैंक मजबूत करने में सरकारी कर्मचारी का काफी बड़ा योगदान है। लिहाजा सत्ता में अगर भाजपा भी होती, तो भी वो ग्रुप सी और डी को लोकपाल में लाने से कतराती।
खैर अब इस लड़ाई के लिए अन्ना का एक दिन का अनशन शायद महज एक संकेत होगा, जिसे सरकार पूरी तरह हलके में ले रही है। सरकार की तरफ से अन्ना के अनशन को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं है। सशक्त लोकपाल की असली जंग 26 दिसेबर से शुरू होगी जब अन्ना रामलीला मैदान में अनशन पर बैठेंगे। और उसके बाद जब वो देश भर में घूम-घूम कर कांग्रेस का चीरहरण करेंगे।












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