26 लाख में बिकने वाली थी सबसे बड़ी रियल स्टेट कंपनी डीएलएफ

डीएलएफ की स्थापना केपी सिंह के ससुर चौधरी राघवेंद्र सिंह ने 1946 में की थी, लेकिन नेशनल कैपिटल के विकास के लिए सिर्फ दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) को ही एक मात्र एजेंसी बनाने के सरकार के निर्णय से यह बिजनेस बहुत परवान नहीं चढ़ सका। दूसरी ओर, हरियाणा में भी तमाम जटिल कानूनों के कारण निजी डेवलपरों के लिए कारोबार शुरू कर पाना मुश्किल था। ऐसे में भूमि मालिकों और सरकार के साथ केपी सिंह का हिम्मत न हारने वाला संवाद और तमाम मुद्दों पर सहमति बना लेने के कौशल ने डीएलएफ को देश की सबसे बड़ी रीयल एस्टेट कंपनी बना दिया।
केपी सिंह के उत्तर प्रदेश के बुलंद शहर में नंगे पैर स्कूल जाने से लेकर डीएलएफ का मालिक बनने का सफर रोमांचक और प्रेरणादायक है। अपनी किताब में सिंह कहते हैं, 'मेरे पिता ने व्यक्तिगत भारी त्याग कर मुझे इंग्लैंड भेजा।" सिंह के चाचा वायसराय हाउस में (अभी राष्ट्रपति भवन) में अस्तबल के प्रभारी थे। वहां एक बार घूमने के दौरान वायसराय लॉर्ड वॉवेल ने सिंह के घुड़सवारी के हुनर को प्रोत्साहित किया। सिंह बताते हैं, 'इंग्लैंड में सिंह की घुड़सवारी को नई पहचान मिली। इसी दौरान इंग्लैंड में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (आईएमए) की परीक्षा अच्छे ग्रेड में पास की। काफी जद्दोजहद के बाद सिंह ने इंडियन आर्मी के घुड़सवार दस्ता ज्वाइन कर लिया।" इंग्लैंड में रहने के दौरान जूली के प्रति अपने रूमानी लगाव और आत्मीयता को सिंह ने ईमानदारी से बताया है।
जनवरी, 1975 केपी सिंह के जीवन और डीएलएफ का सबसे बड़ा 'टर्निंग प्वाइंट" रहा। कंपनी की खस्ताहाल और कोई भी बड़ा प्रोजेक्ट नहीं होने के कारण अपने ससुर के निर्णय पर सिंह डीएलएफ में अपने शेयर बेचने वाले थे। सिंह कहते हैं, 'मेरे सामने शेयरों के मूल्य के 26 लाख रुपये के चेक पड़े थे। यह रकम लेकर मैं हमेशा के लिए डीएलएफ से अलग होने वाला था। उस समय डीएलएफ के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) वाईएस तयाल, जिन्हें मेरे ससुर ने शेयर ट्रांसफर फार्म के साथ भेजा था, ने कहा कि एक बार इस पेपर पर किए गए आपके दस्तखत डीएलएफ से आपको हमेशा के लिए बाहर कर देंगे। प्लीज, इस पर सावधानीपूर्वक विचार करिए। मैं कुछ हफ्ते में रिटायर हो जाऊंगा, लेकिन जो मुझे उचित लगा मैंने कह दिया। यह मेरी नैतिक जिम्मेदारी थी।"
सिंह खुद मानते हैं कि यह उनके लिए 'वेकअप कॉल" थी। आखिरकार सिंह ने अपने एक दोस्त के कहने पर शेयर बेचने का निर्णय टाल दिया। और आज वह देश की सबसे बड़ी रीयल एस्टेट कंपनी के मालिक हैं। 'सिंह के जीवन का संघर्ष देश-दुनिया में कोई अद्वितीय या अभूतपूर्व नहीं है, बल्कि यह एक कारोबार को तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पल्लवित करने और शीर्ष पर पहुंचाने की संघर्ष गाथा है।"












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