स्थानीय निकायों में प्रशासकों की नियुक्ति का रास्ता साफ

इस मामले में बुधवार को दो जजों की खण्डपीठ ने फैसला दिया है कि अध्यक्ष के पांच वर्ष का कार्यकाल डी.एम. द्वारा उसे दिलायी गयी शपथ तिथि से माना जायेगा। अदालत ने निर्णय में स्पष्ट किया है कि अध्यक्ष द्वारा बुलायी गयी प्रथम बैठक की तिथि से उसके कार्यकाल की गणना नहीं की जा सकती। यह फैसला न्यायमूर्ति अमिताव लाला व न्यायमूर्ति पी.के.एस. बघेल की खण्डपीठ ने नगर पंचायत बुलंदशहर के अध्यक्ष अजमल खां उर्फ छोटे की याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
याचिका के अधिवक्ता एस.डी. दुबे का तर्क था कि अध्यक्ष के कार्यकाल की गणना उसके द्वारा बुलायी गयी प्रथम मीङ्क्षटग की तिथि से पांच वर्ष तक गिना जाना चाहिए। उसके अनुसार याची का कार्यकाल 23 जनवरी 2012 को समाप्त होगा। कहा यह भी गया था कि लखनऊ बेंच के दो जजों की खण्डपीठ ने इस मामले में अंतरिम आदेश पारित कर प्रदेश में प्रशासकों की नियुक्ति पर फिलहाल रोक लगा दी है।
याचिका का विरोध प्रदेश सरकार के अपर महाधिवक्ता एस.जी. हसनैन. एम.सी. चतुर्वेदी व रामानन्द पाण्डेय स्थायी अधिवक्ता ने किया तथा कहा कि लखनऊ बेंच का आदेश अंतरिम आदेश है। इस कारण वह पक्षकारों पर बाध्यकारी नहीं है। याचिका के विरोध में बहस की गयी कि युनिसिपलिटी ऐक्ट की धारा 43 डी.4. में यह व्यवस्था है कि अध्यक्ष को डी.एम. द्वारा शपथ दिलायी जायेगी।
कहा गया था कि डी.एम. द्वारा अध्यक्ष को दिलायी गयी शपथ ही प्रथम बैठक तिथि मानी जायेगी और उसी तिथि से अध्यक्ष का पांच वर्ष का कार्यकाल गिना जायेगा। न्यायालय ने अपने फैसले में जिलाधिकारी द्वारा दिलायी गयी शपथ को ही प्रथम बैठक मानकर उसी दिन से कार्यकाल की गणना को कहा है।












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