यूपी की राह राहुल के लिए नहीं आसान

राहुल गांधी अपने इस दौरे वर पूर्वी उत्तर प्रदेश की ज्वलंत समस्याओं पर चुप्पी साधे रहे, जिससे इन ज्वलंत मुद्दों के समाधान की दिशा में किसी सार्थक पहल की उम्मीद रखने वालों को मायूसी हुई। राहुल गांधी ने गोरखपुर जिले में स्थित बन्द पड़ा खाद कारखाना, दिमागी बुखार की भयावहता, बंद शुगर मिल, गन्ना किसानों की बदहाली व बुनकरों की परेशानी आदि मुद्दों का जिक्र तक नहीं किया।
राहुल गांधी ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) में भ्रष्टाचार की बात कही मगर बुनकरों को दिये गये राहत पैकेज पर बहुत जोर नहीं दिया। दिमागी बुखार से प्रतिदिन मौतें हो रही है इससे विकलांग हुए लोगों की अलग समस्या है। बाबा राघवदास मेडिकल कालेज संसाधनों की मार झेल रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग की बुरी हालत है मगर इन तमाम मुद्दों पर राहुल गांधी को इस क्षेत्र में जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ा।
महाराजगंज जिले में भी पार्टी में टिकट बंटवारे को लेकर फैले असंतोष से कांग्रेस महासचिव को रूबरू होना पड़ा। बलरामपुर और बहराइच में भी ऐसा ही विरोध देखने को मिला है। इस दौरे से मिले अनुभव ने राहुल गांधी को यह सोचने पर जरूर मजबूर किया होगा कि परिस्थितियां उतनी आसान नहीं है जैसा कि पार्टी नेता उनसे बता रहे थे। जमीनी हकीकत यह है कि कांग्रेस को कड़ा संघर्ष करना है।
वहीं पांच दिनों तक राहुल गांधी के दौरे के बाद बहुजन समाज पार्टी के दलितों तथा पिछड़ों के महासम्मेलन ने पूर्वांचल के राजनीतिक तापमान को बढ़ा दिया है। इस क्षेत्र में पिछड़ों और दलितों की जनसंख्या सबसे अधिक है जो चुनाव में प्रमुख भूमिका अदा करते हैं। मायावती ने दलित और पिछडों को भाई-भाई कहकर एक नया राजनीतिक कार्ड खेल दिया है जिससे पिछड़ी जातियों के आधार पर राजनीति करने कांग्रेस की मुश्किलें और बढ़ गयीं हैं।












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