क्या ऐसे खत्म हो पायेगी तत्काल टिकट की दलाली?

वाक्ये पर दोबारा लौटते हैं। आईआरसीटीसी पर तत्काल टिकट बुक नहीं होना तो आम हो गया है। दूसरे दिन मैंने सोचा कि 4 तारीख का तत्काल टिकट लेने के लिए काउंटर चला जाता हूं, वहां सबसे आगे लाइन में लग जाउंगा। आंख खुलते ही मैं जयानगर फोर्थ ब्लॉक स्थित काउंटर पहुंचा। देखा करीब डेढ़ सौ लोग सुबह छह बजे से तत्काल टिकट के लिए लाइन में लगे हुए हैं। मुझे तभी अंदाजा हो गया कि अब टिकट नहीं मिलेगा, लेकिन फिर भी मैं लाइन में लगा और निराशा लेकर लौट आया।
अगले दिन मैं सुबह 3 बजे उसी काउंटर पर पहुंचा। ऐसा नजारा मैंने कभी अपने जीवन में नहीं देखा था। मरम्मत कार्य की वजह से फर्श खोद दिया गया था औ र मिट्टी बिछा दी गई थी। उसी मिट्टी पर अखबार बिछाकर करीब 40 लोग सोते नजर आये। असल में वो थे ट्रैवेल एजेंसियों के नौकर जो एक रात पहले ही लाइन में लग जाते हैं। उन्हें सिर्फ काउंटर के बाहर रात बिताने का पैसा मिलता है। सुबह होते ही ट्रैवेल एजेंट खुद पहुंचे और उनकी जगह लाइन में लग गये। मंत्री जी से मैं अगला सवाल यह पूछा चाहूंगा कि तत्काल टिकट लेने के लिए ट्रैवल एजेंटों के इन कारनामों से रेलवे कैसे निपटेगा। शायद कभी नहीं, क्योंकि ऐसा करना कानून गलत नहीं है।
उस दिन मुझे टिकट मिल गया और मैं एक दिन बाद सफर करने के लिए ट्रेन पर पहुंचा। संयोग से वहां मेरी मुलाकात एयरफोर्स के एक कर्मचारी से हो गई, जिसकी रेलवे कर्मचारी यूनियन के पदाधिकारियों व ट्रैवल एजेंटों से खूब पटती थी। बातों-बातों में उन्होंने बताया कि किस तरह आठ बजते ही काउंटर पर तत्काल टिकटों का खेल होता है। उसमें बुकिंग क्लर्क को एक टिकट पर 50 रुपए से लेकर 200 रुपए तक दिये जाते हैं। ऐसे में मंत्री जी से अंतिम सवाल यही है कि दलालों पर नकेल कसने से पहले क्या आप अपने बुकिंग क्लर्कों पर कोई ऐक्शन लेंगे, जो हर सुबह महज 15 मिनट में एक से डेढ़ हजार रुपए तक कमा लेते हैं?
यदि रेलवे के पास इन सवालों के जवाब हैं, तब तो हम मान सकते हैं कि तत्काल टिकटों की नई व्यवसथा कारगर साबित होगी, अगर नहीं, तो शायद यह सेवा दलालों और बुकिंग क्लर्कों तक पहुंचने वाले कमीशन को और ज्यादा बढ़ा देगी।












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