सेन दूसरे न्यायाधीश जिन्हें करना पड़ा महाभियोग प्रस्ताव का सामना

Justice Sen is 2nd Justice who faces impeachment trial
नई दिल्ली। कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन देश के इतिहास में दूसरे ऐसे न्यायाधीश हैं, जिन्हें अनाचार के आरोप में महाभियोग की कार्यवाही का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी पर मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया, क्योंकि सत्ताधारी कांग्रेस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने उस समय लोकसभा में न्यायमूर्ति रामास्वामी का बचाव किया था। वहीं पिछले दिनों सिक्कम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी. दिनकरन के खिलाफ भी महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी थी पर सुनवाई के कुछ दिनों पहले ही दिनकरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। दिनकरन पर भूमि पर कब्ज़ा करने और आय से अधिक संपत्ति के मामले थे।

महाभियोग क्या है?

महाभियोग का अर्थ अनाचार के लिए आरोपित किया जाना होता है। संविधान के अनुसार उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों व मुख्य न्यायाधीशों को तथा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों व प्रधान न्यायाधीश को अनाचार और अयोग्यता के आरोप साबित होने पर संसद के दोनों सदनों में एक प्रस्ताव पारित हो जाने के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।

महाभियोग की प्रक्रिया क्या है?

राज्यसभा का हर सदस्य न्यायमूर्ति सेन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर मतदान करेगा। राज्यसभा में महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने वाले सेन दूसरे न्यायाधीश हैं। चूंकि सांसद जूरी के सदस्य के रूप में काम करेंगे, लिहाजा उन्हें व्हिप का सामना नहीं करना होगा। महाभियोग प्रस्ताव तभी पारित होगा, जब कम से कम 50 प्रतिशत सांसद उपस्थित होंगे और उसमें से दो-तिहाई प्रस्ताव के पक्ष में वोट देंगे। यदि राज्यसभा में प्रस्ताव पारित हो गया, तो यह एक सप्ताह के भीतर लोकसभा में जाएगा।

सेन पर क्या था आरोप?

न्यायमूर्ति सौमित्र सेन पर 1990 के दशक में लगभग 24 लाख रुपये के गबन का आरोप है। उस समय वे वकील थे और कलकत्ता उच्च न्यायालय ने उन्हें रिसीवर नियुक्त किया था। सौमित्र सेन-संसद में महाभियोग का सामना। रिसीवर रहते हुए एक केस में 33 लाख रुपए सेविंग अकाउंट में जमा कराए। जांच में दोषी। इसी हफ्ते इस्तीफा।

इससे पहले भी न्‍याय की गरिमा वाले इस पद पर बैठे लोगों पर भ्रष्‍टचार में लिप्‍त होने के मामले सामने आए हैं। पीडी दिनाकरन-कर्नाटक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पर भी रिश्‍वत का मामला सामने आया था। वे सुप्रीम कोर्ट के जज बने थे। भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद उनका सिक्किम हाईकोर्ट में तबादला हो गया। इसके बाद उन्‍होंने इसी साल जुलाई में अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

निर्मल यादव-पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस थे। अगस्त 2008 में उन पर 15 लाख रुपए की रिश्‍वत लेने का मामला सामने आया था। सुप्रीम कोर्ट की कमेटी, सीबीआई व पुलिस की ने इस मामले की जांच की थी। इसके बाद उनका उत्तराखंड हाईकोर्ट में स्थानांतरण हो गया था। इस समय उनके खिलाफ सीबीआई की स्पेशल कोर्ट में मामला चल रहा है।

अरुण मदान जो कि राजस्थान हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस के पद पर तैनात थे। उन पर यौनाचार व आर्थिक अनियमितताओं के आरोप लगे थे। सुप्रीम कोर्ट ने 3 जजों की कमेटी से इस मामले की जांच कराई। इसके बाद उन्‍होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। इसी तरह दिल्ली हाईकोर्ट की जज शामित मुखर्जी पर डीडीए भूमि घोटाले में 2008 में रिश्‍वत लेने का मामला सामने आया था। उनके साथ इस मामले में 4 और भी जज शामिल थे। इस मामले की जांच चल रही है।

वी. रामास्वामी- पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के जज। उन पर भ्रष्टाचार का मामला सामने आया था। महाभियोग का सामना करने वाले पहले जज थे। के. वीरास्वामी-मद्रास हाईकोर्ट। भ्रष्टाचार के मामले में दोषी। जस्टिस वायके सभरवाल विवादों के चलते ही मानवाधिकार आयोग में आने से वंचित।

देश में महाभियोग के अन्य प्रस्ताव?

देश में महाभियोग की कार्यवाही का पहला मामला सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी. रामास्वामी का था। उनके खिलाफ मई 1993 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन यह प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया था, क्योंकि सत्ताधारी कांग्रेस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया था। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता और वर्तमान में केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने उस समय लोकसभा में न्यायमूर्ति रामास्वामी का बचाव किया था।

आखिर कौन चुने जजों को?

राज्यसभा ने कलकत्ता हाईकोर्ट के जिन जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग पारित किया, उनकी नियुक्ति कॉलेजियम सिस्टम के तहत सीनियर जजों ने ही की थी। 1993 में चीफ जस्टिस जेएस वर्मा के फैसले से यह सिस्टम शुरू हुआ। अब खुद जस्टिस वर्मा इसके विरोध में हैं। तब इस मामले में कॉलेजियम सिस्टम की पैरवी करने वाले कानूनविद् फली एस. नरीमन बदलाव के पक्षधर हैं। राज्यसभा में सेन पर चले महाभियोग प्रस्ताव की बहस के दौरान अधिकतर सांसद भी इसके खिलाफ थे। 1993 के पहले राजनीतिक सिफारिशों से होने वाली नियुक्तियों की व्यवस्था खारिज हो ही चुकी है। सवाल यह है कि आखिर बड़ी अदालतों में जजों का चयन कौन करे?

देश के अनुभवी विधि विशेषज्ञ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के ज्यादातर पूर्व जज नियुक्ति प्रक्रिया के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन के पक्ष में हैं। लेकिन सरकार आयोग बनाने की बजाए जजों की जवाबदेही तय करने के लिए ज्युडिशियल अकाउंटेबिलिटी बिल संसद में पेश कर चुकी है। हालांकि 2003 में तत्कालीन एनडीए सरकार ने संविधान के 98 वें संशोधन बिल के जरिए राष्ट्रीय आयोग बनाने की पहल की थी। पांच सदस्यीय इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के दो सबसे सीनियर जज के अलावा केंद्रीय कानून मंत्री और प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा नामित एक प्रतिष्ठित व्यक्ति आयोग में शामिल होते। लेकिन बिल पास होने के पहले ही सरकार चली गई।

वेंकटचलैया समिति की सिफारिश

पूर्व चीफ जस्टिस एमएन वेंकटचलैया की अध्यक्षता में गठित समिति ने भी सरकार को सुझाव दिया कि नियुक्ति प्रक्रिया पर पुनर्विचार हो और एक नया सिस्टम बने। विधि विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉलेजियम में मनमानी और पक्षपात की पूरी गुंजाइश है। चीफ जस्टिस एसएच कपाड़िया का कहना है कि ईमानदार जजों को न्यायिक आयोग या ज्युडिशियल अकाउंटेबिलिटी बिल से डरने की जरूरत नहीं। इससे भी कड़े सिस्टम की जरूरत है। स्वतंत्रता से ज्यादा जरूरी है जजों की ईमानदारी।

70 फीसदी जज होते हैं सीनियर वकील

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 70 फीसदी जज सीनियर वकीलों में से चुने जाते हैं और 30 फीसदी निचली अदालतों से प्रमोशन के जरिए। बीते वर्षो में पदों से हटने वाले जस्टिस शामित मुखर्जी और जस्टिस अरुण मदान से लेकर जस्टिस सौमित्र सेन केस में विशेषज्ञ मानते हैं कि चयन के दौरान इन जजों से जुड़े अहम और जरूरी तथ्यों की अनदेखी हुई। हालांकि जस्टिस आरसी लाहोटी कहते हैं, 'ऐसे मामलों से पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करना मुनासिब नहीं है।

कहीं गलती हुई तो यह नियुक्ति करने वालों का दोष है।" भ्रष्टाचार के आरोप में कई जज कुर्सियां गंवा चुके हैं। यह हाल तब है जब पिछले 18 साल से सीनियर जज ही जजों को चुन रहे हैं। एक साल पहले पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री शांति भूषण ने यह कहकर चौंकाया था कि सुप्रीम कोर्ट के 16 पूर्व मुख्य न्यायाधीशों में से आठ पूरी तरह भ्रष्ट थे। छह को ईमानदार बताते हुए उन्होने बाकी दो के बारे में 'कुछ कहने" से इंकार कर दिया था। देश की सबसे बड़ी अदालत की सबसे ऊंची कुर्सी पर रहे जजों पर यह पहली सख्त टिप्पणी थी। जस्टिस सेन और जस्टिस दिनाकरन के मामलों ने यह साबित किया है कि गड़बड़ियों का दायरा दूर तक फैला हुआ है।

जजों का चयन: तब, अब और आगे

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राज्यों के मुख्यमंत्री की सलाह के बाद तय नाम सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को भेजते थे। ये नाम केंद्रीय कानून मंत्रालय के जरिए प्रधानमंत्री तक जाते थे। फिर इन्हें राष्ट्रपति के पास भेजा जाता था। यानी जजों के चयन में राज्य और केंद्र सरकारों का हस्तक्षेप था। फिर कॉलेजियम 1993 से व्यवस्था बदली। राजनीतिक दखल खत्म हुआ। चीफ जस्टिस के साथ सीनियर जज मिलकर चुनने लगे जजों को। सुप्रीम कोर्ट में चार और हाईकोर्ट में दो सीनियर जजों के कॉलेजियम।

स्वतंत्र न्यायिक आयोग से ही सुधार संभव

एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायिक आयोग, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के नुमांइदे और विषय विशेषज्ञ शामिल हों। यह आयोग ही अपने समक्ष आने वाले आवेदनों में से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम तय करे और नियुक्तिकी सिफारिशें सरकार को दे। आवेदकों की काबिलियत और अनुभव की गहन जांच-पड़ताल के साथ चयन की प्रक्रिया पारदर्शी हो। ज्युडिशियल अकाउंटेबिलिटी बिल के जरिए भी सरकार सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रही है। हालांकि जजों की नियुक्तिको सुधार की पहली सीढ़ी बताते हुए विशेषज्ञों की राय है कि आयोग के जरिए ही सुधार मुमकिन होगा।

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