अकेले दम यूपी में कांग्रेस की वापसी करा पाएंगे राहुल?

उत्तर प्रदेश में आम जनता के साथ कुछ भी घटना होती है राहुल गांधी उसको राजनीतिक रंग देने के लिए मौके पर पहुंच जाते हैं। इसी मुहिम में वे मंगलवार को पहुंचे हैं उत्तर प्रदेश के हाल के सबसे चर्चित कांड भट्टा परसौल के दौर पर। जहां भूमि अधिग्रहण को लेकर पुलिस और किसानों के बीच संघर्ष हुआ था।
यहां राहुल गांधी पहले भी पहुंच चुके हैं। इस इलाके में माया सरकार ने धारा 144 लागू कर रखी है। जिस वजह से भीड़ इकट्ठा करने के आरोप में तब 11 मई को राहुल गांधी को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। इस बार राहुल गांधी यहां पहुंचे गुपचुप तरीके से। यहां इनका 3 दिन तक रहने का इरादा है। पूरे इलाके का पैदल मार्च करेंगे।
भट्टा परसौल में हुए हादसे की मदद से यूपी में जनाधार हासिल करने का ख्वाब देख रहे राहुल गांधी ने यहां किसान महापंचायत आयोजित करने की योजना बनाई थी। प्रदेश सरकार ने उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं दी। इसके बाद राहुल गांधी ने यह किसान महापंचायत अलीगढ़ में आयोजित करने का फैसला किया है।
स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को रखा है दूर
राहुल जब भट्टा परसौल पहुंचे तो वहां के किसी स्थानीय कांग्रेसी नेता को उनके वहां पहुंचने की भनक तक नहीं थी। यहां तक कि राहुल गांधी कई गांवों को पैदल दौरा कर आगे बढ़ चुके थे फिर भी कोई नेता उनके साथ नजर नहीं आया। इस बात का जब खुलासा हुआ तो यह बात सामने आई कि राहुल ने कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने इस दौरे में शामिल ही नहीं किया था।
सुबह 6:30 बजे से शुरू हुई उनकी पदयात्रा 3 दिनों तक चलेगी। उनकी इस पदयात्रा में उन्हें आम जनता का साथ मिल रहा है। लेकिन स्थानीय नेताओं के साथ न होने पर वहां के लोग भी हैरान हैं। जनता भी राहुल से यह सवाल कर रही है कि उनके स्थानीय नेता उनके साथ क्यों नहीं हैं।
राहुल गांधी की पद यात्रा का राजनीतिक लाभ वे कांग्रेसी नेता भी उठाना चाहते थे जिन्हें यहां से चुनाव लड़ना है। उन्होंने खुद को इस पदयात्रा में शामिल करने की राहुल से अपील भी की थी। इसके बावजूद राहुल ने उन्हें अपनी इस यात्रा में शामिल नहीं किया। राहुल के इस फैसले से स्थानीय नेताओं की छवि को नुकसान जरूर हुआ।
इससे पहले राहुल गांधी लखीमपुर के निघासन में हुए सोनम हत्याकांड के मामले में भी पीडि़त परिवार से मिलने पहुंचे थे। उस समय भी वहां के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को उनके वहां पहुंचने की भनक तक नहीं लग पाई थी। राहुल अकेले वहां पहुंचे और बिना वहां के स्थानीय नेताओं से मिले वापस आ गए।
यही सबकुछ गाजीपुर में हुआ था। राहुल गांधी गाजीपुर कब पहुंचे और कब वापस आ गए वहां के स्थानीय नेताओं को इसके बारे में पता तक नहीं चला। आम जनता वहां के नेताओं से यही सवाल कर रही है कि राहुल गांधी के दौरे के बारे में वहां के ही नेताओं को क्यों नहीं पता होता है।
आम जनता के बीच पहुंच राहुल गांधी वहां के लोगों को अपने पास तो ला रहे हैं लेकिन उन नेताओं से दूर कर रहे हैं जिन्हें वहां से चुनाव लड़ना है। उनकी इस तरह की मुहिम से ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी हर सीट से खुद ही चुनाव लड़ने वाले हैं। अपने दौरों में स्थानीय कांग्रेसी नेताओं को शामिल न करने के पीछे राहुल की क्या रणनीति है यह तो वे ही बता सकते हैं लेकिन इसका खामियाजा कहीं स्थानीय नेताओं को न उठाना पड़े।
लोग कहते हैं कि अकेला चना कभी पहाड़ नहीं उखाड़ सकता है। शायद राहुल गांधी ने इसे बदलते हुए मायावती सरकार के पहाड़ रूपी शासन को अकेले दम ही उखाड़ने का फैसला कर रखा है। उनके इस अभियान को 2009 में हुए लोकसभा चुनावों में तो तगड़ा झटका लगा था जब पार्टी की प्रदेश में बुरी हालत हो गई थी। अब 2012 में होने वाले विधानसभा चुनावों में उनकी यह रणनीति कितनी कारगर होती है यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे।












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