निकाह के तुरंत बाद लिये अग्नि के फेरे!

Muslim couple in tied knot under Hindu Rituals
बैतूल। मध्‍य प्रदेश में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत 249 जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया गया। विवाह से पहले सभी ने अपना पंजीकरण कराया और एक साथ मंडप पर बैठे। योजना के अंतर्गत एक ऐसा विवाह हुआ, जिसमें मुस्लिम युवक-युवती का पहले निकाह पढ़ा गया और ठीक एक घंटे के बाद दोनों ने हिन्‍दू रीति-रिवाज के साथ अग्नि के सात फेरे लिये। जरा सोचिये ऐसा क्‍यों हुआ। असल में यह गरीब दंपत्ति कन्‍यादान योजना के तहत मिलने वाली धनराशि का लाभ लेना चाहते थे।

इससे यह भी साफ हो गया है कि भारतीय जनता पार्टी की हिन्‍दूवादी मानसिकता किस तरह मध्‍य प्रदेश की जनता पर हावी है। चलिये हम आपको ले चलते हैं उस मंडप पर जहां यह विवाह संपन्‍न हुआ। बैतूल के भैंसदेही की रहने वाली रूबीना परवीन का विवाह परतवाड़ा धूतरखेड़ा निवासी कदीर खान से तय हुआ। जिसमें दोनों पक्षों ने 19 मई को सामूहिक विवाह में विवाह कराने के लिए चिचोली जनपद में पंजीयन कराया।

दोनों पक्ष विवाह के लिए कार्यक्रम स्थल हरदू पहुंचे तो वहां पर मुस्लिम पद्धति से विवाह कराने के लिए कोई मौलवी मौजूद नहीं था। परिजनों ने अपने संपर्क से मौलवी को बुलाया और निकाह पढ़ावाया। चूंकि उन्‍हें कन्‍यादान योजना का लाभ लेना था लिहाजा सामूहिक विवाह का हिस्‍सा बनना अनिवार्य था। मंडप में बैठने को लेकर अधिकारियों के दबाव लगातार जारी था। ऐसी परिस्थिति में गायत्री मंत्रोच्चार के साथ उक्त दोनो मुस्लीम युवक-युवती का हिंदू रीति रिवाज से विवाह संपन्न कराया गया। दूल्हे ने बकायदा दुल्हन को वरमाला पहनाई, मांग में सिंदूर भरा और मंगलसूत्र पहनाकर अग्नि के सात फेरे भी लिए। इस विवाह कार्यक्रम में अजाक मंत्री कुंवर विजय शाह भी मौजूद थे।

मुस्लिम धर्म गुरुओं ने किया दंपत्ति का बहिष्‍कार

बैतूल के धर्मगुरुओं ने इस निकाह-विवाह को मानने से इंकार कर दिया है। धर्मगुरुओं का कहना है कि परवीन और कादीर ने हिन्‍दू रीति-रिवाज से विवाह कर धर्म परिवर्तन कर लिया है। अब उनका मुस्लिम समुदाय से बहिष्‍कार किया जाता है। इस विवाह को निकाह में बदलने का कोई तरीका न देख कर अब युवक और युवती के माता-पिता पर प्रशानिक दबाव और लालच देकर उन्हे मनाया जा रहा हैं कि वे इस मामले को तूल न दे। उक्त विवाह के बाद मुस्लीम संगठनो एवं संस्थाओं के द्वारा उक्त विवाह को अस्वीकार करने के बाद अब मामला तूल पकड़ता नजर आ रहा है।

युवती के मामा हबीब खान का कहना था कि हमने 19 मई को पंजीयन करा लिया था तो इन्हें समय पर निकाह के लिए मौलवी की व्यवस्था करना चाहिए थी, जो नहीं की गई। ऐसी स्थिति में आयोजकों ने कहा कि मुख्यमंत्री कन्यादान योजना की इसी पद्धति से विवाह करा लो तो हमारे पास कोई दुसरा विकल्प नहीं था और अधिकारी कर्मचारी लगातार दबाव बना रहे थे इसलिए हमे उक्त विधि से विवश होकर विवाह करना पड़ा। हमारी मजबुरी का एक प्रकार से प्रशासन ने फायदा उठा लिया। हालाकि हमने उन्हें कुछ देर प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया था, जिससे कि मौलवी की व्यवस्था की जा सके। लेकिन किसी ने हमारी बात नहीं सुनी और विवाह हो गया। हालांकि अब परिवार का कहना है कि दोनों का निकाह मौलवी द्वारा ही कराया गया था, उसके बाद विवाह हुआ। हालांकि वे निकाहनामा नहीं प्रस्‍तुत कर पाये हैं।

परिवार ने बताया कि प्रशासन द्वारा बुलाये गये मौलवी आये तो उन्‍होंने हिन्दु रीति से हो चुके विवाह को निकाह में बदलने से साफ इंकार कर निकाह करने से मना कर दिया। मध्य प्रदेश मुस्लिम त्यौहार कमेटी के प्रांतीय सचिव एवं अंजुमन कमेटी सारनी के महासचिव अब्दुल रहमान खान के अनुसार शरीयत यह कहती है कि दो गवाह और एक वकील की मौजदूगी में तय किया मेहर और उसके कबुलनामे के बिना कोई भी विवाह हराम हैं। निकाह में मौलवी का मौजूद होना और खुदबा पढऩा भी जरूरी हैं। कोई भी निकाह शरीयत के अनुसार बिना काजी या मौलवी की मौजूदगी के करना या करवाना भी इस्लाम विरोधी कृत्य है जिसके लिए दोनो को सजा तक देने का प्रावधान हैं।

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