इतिहास के गवाह हैं चार गुल

इतिहास के गवाह हैं चार गुल
बिलाल सरवारी

;

बीबीसी संवाददाता, काबुल

;

तमाम उथल-पुथल और ख़ूनख़राबे के बावजूद चार गुल की कैंची रुकी नहीं है. दशकों से अशांति के बावजूद काबुल की सैनिक ट्रेनिंग अकादमी में एक हज्जाम ने अपनी दुकान खुली रखी है. चार गुल ने अफ़गान सैनिकों की कई पीढ़ियों की हजामत बनाई है जिनमें से कुछ तो सत्ता की ऊंचाईयों पर पहुंचे और कई मैदान-ए-जंग में काम आए.

;

ये कोई ज़्यादा कमाई वाला पेशा नहीं है लेकिन चार गुल पिछले क़रीब 50 सालों से उथल-पुथल भरे अफ़गानिस्तान के इतिहास में काबुल की ट्रेनिंग अकादमी में सैनिकों के बाल काट रहे हैं. चार गुल कहते हैं, "मेरे पिता चाहते थे कि मैं स्कूल जाऊं. लेकिन मुझे किताबें, इम्तिहान या अध्यापक पसंद नहीं थे. मुझे तो सिर्फ़ ढोल बजाना और बाल काटना अच्छा लगता था."

;

उन्नीस साल की उम्र में चार गुल ने फ़ौज में शामिल होने की ठानी और वे अपने गांव से राजधानी काबुल की ओर निकल पड़े. काबुल की ट्रेनिंग अकादमी में तुरंत ही उनके हुनर को पहचान लिया गया लेकिन एक सैनिक के तौर पर नहीं बल्कि, जी हां, आप ठीक समझे एक हज्जाम के रुप में. चार गुल कहते हैं, "इम्तिहान के तौर पर मुझसे नए रंगरूटों की हजामत बनाने के लिए कहा गया. गति के साथ दक्षता ही फ़ौज की नौकरी का लक्ष्य होता है. मैंने एक घंटे में क़रीब 24 रंगरूटों के बाल काटे."

;

हज़ारों सैनिकों के अलावा चार गुल की कैंची के कायल अफ़गानिस्तान के मौजूदा रक्षा मंत्री भी हैं. वे अब भी कभी-कभार चार गुल के पास आते हैं. चार गुल कहते हैं कि उनका देश एक के बाद एक संकट से जूझता रहा और वे ख़ामोशी बाल काटते रहे. और हां, इन सब सालों में ट्रेनिंग अकादमी अफ़गानिस्तान में कभी ना ख़त्म होने युद्ध के लिए सैनिक तैयार किए जाते रहे.

;

उनके बहुत से ग्राहक फ़ौज के आला अफ़सर बने, कुछ जनरल और कुछेक मंत्री पद तक भी पहुंचे. लेकिन बहुत से रणभूमि में मारे गए. चार गुल जंग की क्रूरता से अनजान नए और नर्वस रंगरुटों के हमेशा विश्वासपात्र रहे हैं. रंगरूट हमेशा उनसे अपनी व्यक्तिगत समस्याओं के बारे में बात करते हैं. चार गुल कहते हैं, "फ़ौजी अपने गांव को याद करते हैं.वो पत्नियों और गर्लफ़्रैंड के बारे में बतियाते हैं. वो युद्ध की थकान और कभी-कभी जंग के बारे में मुझसे सवाल करते हैं."

;

यहां से निकले कई सैनिक उच्च पदों पर पहुंचे हैं और वे अब भी चार गुल के संपर्क में रहते हैं. गुल के लिए अब यही घर है, "हाल ही में मुझसे पूछा गया कि क्या मैं रिटायर होना चाहता हूं? लेकिन मैंने तो साफ़ कह दिया कि मैं तो मर के ही रिटायर होऊंगा. यही मेरा परिवार है."

;

चार गुल अब तक मौजूदा अफ़गान राष्ट्रपति हामिद करज़ई से तो नहीं मिले हैं लेकिन वो पिछले कई दशकों से अन्य कई अफ़गान नेताओं से मिलते रहे हैं. अफ़गानिस्तान के आख़िरी सम्राट ज़हीर शाह और पूर्व राष्ट्रपति दाऊद, तराकी, अमीन, बबर्क कर्माल और नजीबुल्ला जब भी ट्रेनिंग अकादमी में आए उन्हें चार गुल से मिलाया गया. ये कहते हुए कि चार गुल सैनिकों के हजामत बनाकर उन्हें साफ़-सुथरा रखते हैं.

;

जब 1960 में चार गुल ने शुरूआत की थी तब अकादमी ज़हीर शाह की सेना के लिए रंगरूट तैयार करती थी. ज़हीर शाह के बारे में चार गुल कहते हैं, " बादशाह कमाल के थे. मैं उनसे तब मिला जब वे यहां एक परेड देखने आए थे. वे बहुत ही मीठा बोलने वाले आदमी थे जिनकी आंखें हमेशा दया से भरी रहती थीं. उनका राज अफ़गानिस्तान का सुनहरा युग था."

;

लेकिन एक दशक बाद बादशाह को उनके चचेरे भाई दाऊद ख़ान ने पदच्यूत कर दिया. और उसके बाद शुरू हुआ घोर अस्थिरता का दौर. फिर सोवियत सेनाएं अफ़गानिस्तान में दाख़िल हो गईं. उस ज़माने को याद करते हुए चार गुल कहते हैं, "रुसी सेनाओं के आगमन के बाद शुरू हुआ ख़ूनख़राबा और विपदा अब तक जारी है."

;

साल 1991 आते-आते उन्होंने छह शासकों का वक़्त देख लिया. चार गुल सोवियत समर्थक राष्ट्रपति नजीबुल्ला के पतन और अमरीका समर्थित अफ़गान मुजाहिदीन के उदय के दौरान भी अपना काम करते रहे. लेकिन इसके बाद पांच बर्षों तक चले भीषण गृह युद्ध को कई अन्य अफ़गानों की तरह चार गुल अपने मुल्क़ का सबसे दुखद समय मानते हैं.

;

चार गुल कहते हैं, "काबुल के हर कोने पर कोई न कोई सरकार थी. एक बार तो एक गुट ने मुझे रोककर लगभग मार ही दिया था लेकिन मेरी तकदीर में अभी और जीना लिखा था." चार गुल ने तालिबान काल में काम करना लगभग बंद कर दिया था.

;

उधर अकादमी के भी बुरे दिन आ गए. गृह युद्ध के दौरान ट्रेनिंग सेंटर रणभूमि में तबदील हो गया. और फिर तालिबान ने वहां रक्षा मंत्रालय का दफ़्तर बना दिया. साल 2001 में जब अमरीका ने तालिबान के अफ़गानिस्तान की सत्ता से हटा दिया, तब सारी इमारतों की मरम्मत की गई. और चार गुल एक बार फिर अपने काम में जुट गए.

;

बचपन का शौक अब भी चार गुल का जुनून है. एक वरिष्ठ अधिकारी चार गुल के बारे में बताते हैं, "सबसे ताज्जुब की बात तो ये हैं कि पिछले चार-पांच दशकों की उथल-पुथल के बावजूद चार गुल की नौकरी बहाल रही है. इसमें देश बहुत कुछ बदला है लेकिन चार गुल की दुकान अब भी वैसी ही है जैसी 1960 में थी."

;

जैसे ही रंगरूट अकादमी में प्रवेश करते हैं उनका परिचय चार गुल से होता. चार गुल और सैनिकों के बीच अपनापन साफ़ झलकता है. "सीधे बैठो" चार गुल एक नए रंगरूट को डांटते हुए कहते हैं, "अब तुम फ़ौज में हो." और हां, फ़ौज चार गुल के बचपन के शौक का भी पूरा ख़्याल रखती है. वे सैनिकों की पासिंग आउट परेड में ढोल बजाते हैं.

;

ढोल के बारे में बात करते ही चार गुल का चेहरा खिल उठता है, " क्या बूढ़े, क्या जवान ढोल बजते ही सभी सैनिक मेरी धुनों पर नाचने लगते हैं. मेरे दिल इससे उम्मीद जगती. अगर संगीत जैसी आम चीज़ हमें इकट्ठा कर सकती है, वतन के लिए मोहब्बत पैदा कर सकती तो ये हमें मुश्किल वक़्त में एकजुट भी रख सकती है."

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+