दिल्‍ली हाईकोर्ट-जामा मस्जिद ब्‍लास्‍ट के पीछे कोई एक ही तो नहीं?

Delhi High Court ans Jama Masjid blasts are similar
दिल्‍ली। दिल्‍ली हाईकोर्ट के बाहर बुधवार को जो बम विस्‍फोट हुआ वह बेशक कम क्षमता का था मगर इस ब्‍लास्‍ट के पीछे मंसूबे बेहद खतरनाक थे। जानकारों और सूत्रों की मानें तो यह बम बिल्‍कुल उसी तरह बनाया गया था, जिस तरह पिछले साल जामा मस्जिद के बाहर प्रेश्‍ार कुकर में मिला था। आपको याद होगा कि बीते साल 19 सितम्‍बर को जामा मस्जिद के पास बाइक सवार दो युवक जो असलहों से लैस थे ताइवानी नागरिकों पर फायर कर फरार हो गये थे।

इस हमले में दो ताइवानी नागरिकों को गोली लगी थी। मामले की जांच अभी चल रही थी कि थाने से चंद कदम की दूरी पर ट्रांसफार्मर के नीचे खड़ी मारुति 800 कार में तगड़ा विस्‍फोट हुआ। जांच में पाया गया कि उसमें भी अमोनियम नाइट्रेट व गन पाउडर मिला था। बिजली के तार, सर्किट व बैटरी आदि भी जांच टीम ने बरामद की थी।

कुकर में लगे टाइमर ने तो सही काम किया, लेकिन बम बनाने का तरीका कारगर नहीं था। इस वजह से थोड़े से दबाव से कुकर का ढक्कन तो ढीला हो गया था, लेकिन विस्फोट नहीं हो पाया। केवल गन पाउडर में आग की लपटें उठीं। अब जरा बुधवार को दिल्‍ली हाईकोर्ट के बाहर हुए बम बलस्‍ट पर भी नजर डालें। इस धमाके में भी पुलिस ने मौके से कील, गन पाउडर व अमोनियम नाइट्रेट जैसे पदार्थ के अलावा कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण कील, बैटरी, तार, फ्यूज बरामद किये हैं।

सूत्रों की मानें तो विस्फोटक में टाइमर का प्रयोग हुआ है। प्रारंभिक जांच में लग रहा है कि अमोनियम नाइट्रेट आदि की मदद से विस्फोटक को शक्तिशाली बनाने की कोशिश तो की गई, लेकिन प्रशिक्षण सही न होने से बम शक्तिशाली नहीं बन पाया। दिल्ली पुलिस अधिकारियों की मानें तो इस तरह की घटनाएं अधिकतर स्थानीय युवकों की मदद से अंजाम दी जाती हैं।

जामा मस्जिद मामले की जांच भी दिल्ली के बदमाशों के इर्द-गिर्द रुकी है। गिरफ्तारी पर 55 लाख का इनाम घोषित हो चुका है, लेकिन जांच एजेंसियां असली आरोपियों तक नहीं पहुंच पाई हैं। बुधवार को दिल्‍ली हाईकोर्ट के बाहर हुए बम ब्‍लास्‍ट के बाद जो चीजें बरामद हुई हैं उनका इस्‍तमाल हमेशा बड़े तबाही के लिये ही किया जाता है।

अमोनियम नाइट्रेट - सफेद रंग का यह केमिकल शहर के हर छोटे बड़े दुकानों पर आसानी से उपलब्‍ध है और खेती के काम में प्रयोग होने के चलते आसानी से मिल जाता है। पेट्रोलियम जेली बनाना बम बनाने वाले के लिए बाये हाथ का खेल होता है। बम बनाने में कील, छर्रे, जूते की कीलें, नट बोल्ट, जिलेटन आदि मिलाकर आसानी से बम बना लेते हैं।

इनके लिए टाइमर डिवाइस बनाना भी बड़ी बात नहीं होती। इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स के मास्‍टर भी इनके आगे फेल हैं। पुलिस फॉरेंसिक एक्‍सपर्ट ने बताया कि माइक्रोचिप और डिजिटल घड़ी। का इस्‍तेमाल किया जाता है। बम में इसे लगाकर बिजली के दो तारों की मदद से जोड़ दिया जाता है। जब घड़ी की दोनों सुइयां निर्धारित समय पर एक दूसरे से छूती हैं तब उसमें करंट दौड़ जाता है और स्‍पार्क की वजह से ब्‍लास्‍ट हो जाता है। अहम बात यह है कि यह सभी चीजें इतनी आसानी से उपलब्‍ध होने के कारण तमाम बम बनाने वाले एक्‍सपर्ट पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ पाते।

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