राहुल गांधी ने बढ़ाया भाजपा का टेंशन
राहुल गांधी के ताबड़तोड़ प्रदेश दौरे ने भाजपा को हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया। भाजपा के राष्ट्रीय एवं प्रदेश अध्यक्ष नितिन गडकरी व सूर्य प्रताप शाही के बयान लोगों को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा के सामने समस्या यह है कि वह मंहगाई को लेकर जनता के बीच जाए या फिर प्रदेश में भ्रष्टाचार के मुद्दे को हवा दे।
नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, सूर्य प्रताप शाही व लालजी टण्डन जैसे नेताओं की हवा निकाल रहे राहुल गांधी भले ही प्रदेश सरकार व मायावती पर वार कर रहे हों परन्तु उसका परोक्ष असर भारतीय जनता पार्टी पर पड़ रहा है।
राहुल गांधी ने दलितों का गरीब किसानों को केन्द्र में रखते हुए चुनावी रणनीति तैयार की और उनके बीच जाकर उनके दुखदर्द सुने। कांग्रेस युवराज ने जिस प्रकार गुपचुप ढंग से भट्टा पारसौल पहुंचकर पंचायत में धरना दिया उससे साबित हो जाता है कि वे किसी भी स्थिति तक जा सकते हैं। भट्टा पारसौल में दिए गए राहुल के धरने के बाद भले ही उन्हें गिरफ्तार कर प्रदेश की सीमा से बाहर कर दिया गया हो परन्तु इस घटना के बाद राज्य में उठे तूफान में मायावती को भी कमरे से बाहर आने पर विवश कर दिया।
राहुल मुद्दे पर सरकार की सफाई देना साबित कर गया कि राहुल ने प्रदेश सरकार की नींव तक हिला दी। राहुल फैक्टर से प्रदेश में चुनावी जंग कांग्रेस व बसपा के बीच सिमट कर रह गयी। दूसरी ओर वाराणसी में कांग्रेस के 83वें अधिवेशन में जिस प्रकार राहुल गांधी ने मायावती सरकार पर वार पर वार किए उसके बाद बौखलायी सरकार ने केन्द्र पर मंहगाई का आरोप लगाते हुए पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया।
मुख्यमंत्री मायावती ने अपने बयान में कहा कांगेस ने प्रदेश में कई वर्षों तक राज किया और इसका विकास नहीं किया। राहुल के दौरों व आरोपों के आगे मायावती का यह बयान भले ही आत्मसंतुष्टि के लिए काफी हो परन्तु लोगों के दिलों में बसपा की जगह बनाने के लिए काफी नहीं है। राहुल गांधी का कहना है कि वह प्रदेश के सभी गांवों में जा सकते हैं लोगों से मिल सकते हैं उनके पास पूरा समय है तथा वे जनता के बीच जाकर लड़ाई लडऩा चाहते हैं।
उनका कहना है कि जनता हकीकत को समझेगी जिसके नतीजे आगामी चुनाव में दिखायी देंगे। राहुल गांधी की सक्रियता से बेहाल भाजपा व सपा आत्ममंथन में जुट गए हैं। भाजपा ने तो अपनी रणनीति में बदलाव के संकेत दे दिए हैं। पार्टी ने अब मुस्लिम वोट की ओर ध्यान लगाना शुरू कर दिया है जबकि समाजवादी पार्टी ग्रमीण स्तर पर जाकर लोगों को साथ जोडऩे का प्रयास कर रही है।
कांग्रेस ने जिस प्रकार यादव वोट बैंक पर कब्जे की मुहिम छेड़ी है उससे सपा में भी बेचैनी है। पार्र्टी में अपराधियों को टिकट दिए जाने के बाद पार्र्टीकी छवि और खराब हो गयी है जबकि भाजपा तो उम्मीदवारों के नामों को लेकर पशोपश में है।













Click it and Unblock the Notifications