ताजगंज शमशान घाट से ताजमहल को खतरा

Taj Mahal
लखनऊ। विश्व की खूबसूरत इमारतों में से एक ताजमहल की खूबसूरती को बचाने वाले तथा पारंपरिक परम्‍पराओं को महत्व देने वालों के बीच तकरार शुरू हो गयी है। आगरा की खूबसूरती चाहने वाले पर्यावरणविद् मानते हैं कि ताज के निकट ताजगंज शमशान घाट से उठने वाला धुंआ इमारत की खूबसूरती को नुकसान पहुंचा रहा है वहीं परंपरावादी लोगों का तर्क कि कि वर्षों से चली आ रही है परंपरा को वे छोड़ नहीं सकते। लोगों का कहना है कि वे शवों का दाह संस्कार वहीं करेंगे जहां वर्षों से करते चले जा रहे हैं।

आगरा का ताजमहल जिसकी खूबसूरती विश्व में प्रसिद्ध है। सफेद संगमरमर से बनी इमारत के संगमरमर की सफेदी में कोई कमीं न आए इसके लिए पर्यावरणविद् व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी लगातार इमारत के इर्द गिर्द के वातावरण की निगरानी करते हैं। यही कारण है कि ताज के आस-पास ऐसे वाहनों का संचालन नहीं होता जिनसे हानिकारक धुआं निकलता हो। वर्तमान समय में एक नयी समस्या खड़ी हो गयी जिसके तहत पर्यावरणविद् व परंपरा में विश्वास रखने वालों के बीच बहस हो गयी है।

पर्यावरणविद् एस. वरदराजन के नेतृत्व वाली विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय समिति ब्रज मंडल हेरीटेज कंजर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष डा. सुरेन्द्र शर्मा व पर्यावरण प्रेमी ब्रज खंडेलवाल आदि ने अंत्येष्टि से उठने वाले धुयें को ताज के लिये खतरा बताते हुये ताज श्मशान घाट को कहीं दूर ले जाने की सिफारिश की है। अधिकारियों का कहना है कि ताज के निकट स्थित ताजगंज श्मशान घाट में शव दाह बंद कर उसे दूसरे स्थान पर ले जाया जाए।

यदि आवश्यकता हो तो वहां पर एक विद्युत शवदाह गृह बना दिया जाए ताकि मान्यताओं को ठेस न पहुंचे और ताज की संन्दरता भी बनी रहे। लेकिन मान्यताओं में बंधे लोग यह मानने को तैयार नहीं हैं। लोगों का मानना है कि यह उनकी परम्‍परा व मान्यता का प्रश्न है वे समझौता क्यों करें। अधिकारी कहते हैं कि शमशान से उठने वाले धुएं से ताज की संगमरमरी सतह को क्षति पहुंच रही है तथा ताज के इर्दगिर्द का वायुमंडल प्रदूषित होने से ताज की खूबसूरती को नुकसान पहुंच रहा हैं।

जबकि लोगों का कहना है कि अंतिम संस्कार बरसों पुराने घाट को छोडकर कहीं और या विद्युत शवदाह गृह में क्यों करें। सामान्यत: करीब सौ लोग उपरोक्त शमशान घाट पर दाह संस्कार के लिए आते हैं। कभी-कभी तो अधजले शव यमुना में प्रवाहित कर दिये जाते हैं। आगरा में पिछले 130 सालों से दाहसंस्कार से संबंधित कार्यो को देख रही संस्था के सदस्य कहते हैं कि समय की मांग को देखते हुए विद्युत शवदाह गृह को समर्थन मिलना चाहिये तथा लोगों को इसका महत्व समझना चाहिये।

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