दंतेवाड़ा : शहादत के एक साल, भूल गये हम, मीडिया और सरकार

आम आदमी बेहद आक्रोशित था, हर कोई कह रहा था गृहमंत्री इस्तीफा दें। इलेक्ट्रानिक चैनलों ने पैनल डिस्कशन करके सरकार को चारों ओर से घेर लिया था। देश के बड़े-बड़े नामचीन अखबार के पहले और दूसरे पन्ने सिर्फ और सिर्फ सरकार से जवानों की मौत का हिसाब मांग रहे थे।
लेकिन आज एक साल बाद क्या, सब मौन है, सरकार भी और मीडिया भी। ना तो किसी ने आज दो मिनट के लिए मौन रखा है, और ना ही किसी मीडिया चैनल में अपनी खबरों में दंतेवाड़ा को जगह दी है। हां एक -दो चैनल है जिन्होंने दंतेवाड़ा को याद किया है लेकिन सिर्फ और सिर्फ फुटकर खबरों के तौर पर। क्या ये लड़ाई खत्म हो गई है, 76 जवान देश के शहीद हो गये, लेकिन क्या उनकी मौत का हिसाब हो गया, वो क्यों शहीद हुए ये मु्द्दा आज भी वहीं है जहां एक साल पहले था, या यूं कहे कि जहां बरसों से हैं।
छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा ज़िले के चिंतलनार इलाके में हुई इस घटना का एक साल बीत चूका है और बस्तर संभाग के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। बस्तर संभाग के 40 हजार वर्ग किलोमीटर के दायरे में रह रहे लोगों, खास तौर पर आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए अविश्वास का माहौल, बारूदी सुरंगों का खौफ और बंदूक़ो के साये के बीच जिन्दगी दिनों दिन मुश्किल होती जा रही है। लेकिन समाधान के नाम पर आज भी वहां कुछ नहीं था।
जो जवान शहीद हुए थे उनके घर आज भी सूने है, जिनकी भरपाई कोई नहीं कर सकता, उनके बच्चे, उनके मां-बाप और उनकी बीवीयों के लिए आज भी जख्म हरे है, लेकिन ना तो सरकार औऱ ना ही हमारा मीडिया जगत आज उनको याद कर रहा है। कोई नही बता रहा कि उन 76 जवानों का परिवार आज कहां है और कैसी जिन्दगी जी रहा है। क्या उनका लहू और आंसू दोनों बेमानी है। उनकी कोई कीमत नहीं है।
देश ने विश्वकप जीता है, विश्वकप के बाद पल-पल की खबर देने वाला हमारा मीडिया जगत आज दंतेवाडड़ा पर खबर क्यों नहीं दिखा रहा है और हमारी दानवीर सरकार खिलाड़ियों पर धनवर्षा करने में लगी हुई है, तो क्यों नहीं उस खजाने का थोड़ा हिस्सा जवानों के परिवार को दे देती है? आखिर क्यों आज सब मौन है, सरकार, हम और मीडिया?












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