छत्‍तीसगढ़: चिंतलनार नक्सली हिंसा के एक साल

चिंतलनार नक्सली हिंसा के एक साल
सलमान रावी

बीबीसी संवाददाता, रायपुर

चिंतलनार हिंसा के एक साल के बाद भी नक्सली हिंसा में कमी नहीं आई है. अप्रैल महीने की छह तारीख़ को केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल या सीआरपीएफ़ के लोग शायद कभी नहीं भूल सकते. इसी दिन 2010 को भारत के इतिहास के सबसे बड़े नक्सली हमले में इस बल के 75 जवान को माओवादियों नें घात लगाकर मार गिराया था. इस घटना में छत्तीसगढ़ की पुलिस का भी एक जवान मारा गया था.

छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा ज़िले के चिंतलनार इलाक़े में हुई इस घटना का एक साल बीत चूका है और बस्तर संभाग के हालात बद से बदतर होते चले जा रहे हैं. बस्तर संभाग के 40 हज़ार वर्ग किलोमीटर के दायरे में रह रहे लोगों, ख़ास तौर पर आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए अविश्वास का माहौल, बारूदी सुरंगों का ख़ौफ़ और बंदूक़ो के साए के बीच ज़िन्दगी दिनों दिन मुश्किल होती जा रही है. यह इलाक़ा रणभूमि में तब्दील हो चूका है.

एक तरफ़ भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की जनमुक्ति छापामार सेना के दस्ते तो दूसरी तरफ़ सुरक्षा बल. इस शह और मात के खेल में पिस रहा है बस्तर का आम आदमी जिसे कभी नक्सली समर्थक होने के आरोप में पुलिस का शिकार होना पड़ता है तो कभी पुलिस का मुख़बिर होने के आरोप में माओवादियों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ता है.

यहाँ के हालात ने इस इलाक़े से लोगों को बड़े पैमाने पर पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया है. कुछ लोग जंगलों से निकल कर निकटवर्ती आन्ध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले में या फिर उड़ीसा के मलकानगिरी में शरण लेने को मजबूर हो गए हैं.

सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच चल रहे इस युद्ध का असर यहाँ की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा है. इस संघर्ष के भेंट चढ़े हैं यहाँ के हाट और साप्ताहिक बाज़ार जो कभी अपनी रौनक़ के लिए जाने जाते थे. पिछले एक साल में बहुत कुछ बदल गया है बस्तर में. सुरक्षा बलों नें भी इस इलाक़े में नई रणनीति अपनाई है जिससे वह माओवादियों के छापामार युद्ध का सामना कर सकें.

हाल ही में छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन नें बीबीसी से बातचीत के दौरान दावा किया कि छह अप्रैल को चिंतलनार में हुई घटना जिसमे 76 जवान मारे गए थे और 29 जून को बस्तर के ही नारायणपुर में हुई घटना जिसमे सीआरपीएफ़ के 29 जवान मारे गए थे को अगर अलग कर देखा जाए तो इस संघर्ष में माओवादियों को ज़्यादा नुक़सान का सामना करना पड़ा है.

विश्वरंजन कहते हैं: "आज नक्सलियों के पास मिलिटरी की 14 कम्पनियाँ हैं जिसमें से उन्होंने 12 को दंडकारण्य में झोंक दिया है. इसके अलावा उनके पास 50 के लगभग स्वतंत्र मिलिटरी प्लाटून हैं जिसमे से 36 दंडकारण्य में कार्यरत हैं. नक्सलियों को पता है कि उनपर सबसे ज़्यादा दबाव दंडकारण्य में पड़ रहा है इस लिए यहां उन्होंने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी है. सिर्फ 2010 में हमने 80 से ज़्यादा नक्सलियों को मार गिराया है जबकि नक्सलियों के पास से बरामद दस्तावेज़ बताते हैं की यह संख्या और भी ज़्यादा है."

वहीं अपनी जनमुक्ति छापामार सेना की स्थापना के दस वर्ष मना रही भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य विशेष ज़ोनल कमिटी के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी का कहना था कि दस वर्षों में माओवादी भी पहले से ज़्यादा मज़बूत हुए हैं.

कौन किसपर भारी पड़ रहा है इसका अनुमान लगाना मुश्किल है मगर इतना तो समझ में आता है कि बस्तर के एक बड़े इलाक़े में माओवादियों की सामानांतर सरकार चलती है. इस संभाग का एक बड़ा इलाक़ा माओवादियों के क़ब्ज़े में है. हालाकि पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन का दावा है कि सुरक्षा बलों नें भी माओवादियों के क़ब्ज़े से काफ़ी इलाकों को मुक्त कराया है.

उधर चिंतलनार घटना की बरसी पर अपने मारे गए साथियों की याद में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के जवान और अधिकारी "चिंतलनार शपथ" ले रहे हैं. यह शपथ सिर्फ छत्तीसगढ़ में तैनात जवान या अधिकारी ही नहीं बल्कि पूरे भारत में बल के जवान और अधिकारी एक साथ लेंगे.

इस शपथ का ख़ाका बल के महानिदेशक के विजय कुमार के द्वारा सभी को भेजा गया है. चाहे वह मुख्यालय में तैनात जवान या अधिकारी हों या फिर बस्तर के सुदूर जंगलों में स्थापित कैंपों में तैनात बल के जवान और अधिकारी.

शपथ का ख़ाका कुछ इस तरह है :"छह अप्रैल 2010 को देश के लिए अपनी भरी जवानी में अपने प्राणों को निछावर करने वाले अपने साथियों को हम भारी मन से याद कर रहे हैं. हमारे यह साथी देश के विभिन्न इलाक़ों से आए थे, वह विभिन्न धर्मों से थे मगर एक साझा उद्देश्य के लिए उन्हें प्रशिक्षित किया गया, वह साथ रहते थे, एक ही लंगर में खाते थे और उन ताक़तों से लड़ रहे थे जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा हैं. हम उनकी कुर्बानी को व्यर्थ नहीं जाने देंगे. हम शपथ लेते हैं हम तब तक चैन नहीं लेंगे जबतक इन देश द्रोही ताक़तों को पूरी तरह शिकस्त नहीं दे देते."

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