कहां गायब हो गया गरीबों का फ्रिज?
गांवों में पहले आवारा जानवरों के अड्डे (रहूनी) हुआ करते थे, जहां के गोबर में मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हारों के अलावा अन्य किसी का अधिकार नहीं होता था। पशुपालन बंद हुआ तो ईंधन में कमी आई, साथ ही बढ़ती आबादी के बीच गांव के किनारे मिट्टी मिलना भी दूभर हो गया। परिणामस्वरूप कुम्हार बिरादरी के लोगों ने अपना पुश्तैनी व्यवसाय छोड़कर खेती-किसानी की ओर मुंह मोड़ लिया।
अमीर लोग तो घड़े के बदले फ्रिज के पानी से अपना गला तर कर लेते हैं, पर गरीबों की मुसीबत है। वे स्टील या लोहे की बाल्टी का गर्म पानी पीने को मजबूर होते हैं।
बांदा जनपद के तेंदुरा गांव के बुजुर्ग बन्ना प्रजापति का कहना है कि उनके पिता रामधनी मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करते थे। तब आसानी से मिट्टी व ईंधन मिल जाता था, अब न तो मिट्टी है और न ही ईंधन। कमर तोड़ महंगाई में मिट्टी व ईंधन खरीद कर बर्तन नहीं बनाए जा सकते।













Click it and Unblock the Notifications