'तमिलनाडू में लिट्टे के शिविर मौजूद हैं'

भारत से छपने वाले दो अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' और 'द हिंदूस्तान टाइम्स' के मुताबिक़ श्रीलंकाई प्रधानमंत्री ने ये बातें बुधवार को श्रीलंकाई संसद में कहीं. अख़बार के अनुसार इन शिविरों में तमिल छापामारों को प्रशिक्षण दिया जाता है. इन शिविरों में से एक में तो ख़ास तौर पर सिर्फ़ महत्वपूर्ण लोगों की हत्या करने की ट्रेनिंग दी जाती है.
श्रीलंका की समाचार एजेंसी लंकापुवथ के अनुसार लिट्टे ख़ुद को तीन अलग-अलग गुटों में दोबारा संगठित होने की कोशिश कर रहा है. तीन लोग इन तीन गुटों का नेतृत्व कर रहे हैं. बुधवार को संसद में आपात काल की समय सीमा बढ़ाए जाने पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले गुट का नेतृत्व अमरीका में रहने वाले वी रूद्रकुमार कर रहे हैं, दूसरे गुट का नेतृत्व नॉर्वे स्थित टेडियावन कर रहे हैं जबकि तीसरे गुट का नेतृत्व भारत में रह रहे विनयगम कर रहे हैं.
2009 में लिट्टे के ख़िलाफ़ श्रीलंकाई सेना के ऑपरेशन के अंतिम चरण में विनयगम भारत भाग गए थे. प्रधानमंत्री के अनुसार इन शिविरों का मुख्य उद्देश्य श्रीलंका में हिंसा फैलाना है. प्रधानमंत्री जयरत्ने ने कहा कि भारतीय राजनेताओं की हत्या और श्रीलंका में गृह युद्द कराने की साज़िश रची जा रही है.
उन्होंने कहा कि ख़ुफ़िया एजेंसी को तमिलनाडू में चल रहे तीन शिविरों की जानकारी मिली है. एक शिविर में तमिल छापामारों को ख़ास तौर पर राजनेताओं की हत्या करने की ट्रेनिंग दी जा रही है. पुगलंद्र मास्टर नाम का एक आदमी इसकी देख रेख कर रहा है. जयरत्ने ने बताया कि इसी समूह ने हाल ही में चेन्नई के महाबोधी ऑफ़िस पर हमला किया था.
श्रीलंका के एक अधिकारी के मुताबिक़ ख़ुफ़िया एजेंसी ने तमिलनाडू-केरल की सीमा पर पिचुमलाई गांव में शिविर चलने की सूचना दी थी. लेकिन श्रीलंका में विपक्ष के नेता रानिल विक्रमसिंघे ने प्रधानमंत्री के इस दावे पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा कि क्या सरकार ने भारत के सामने इस मुद्दे को उठाया है. प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के किसी भी सहयोगी ने इसका कोई जवाब नहीं दिया.
प्रधानमंत्री के इस अनेपक्षित दावे पर कोलंबो में राजनयिकों की तरफ़ से बहुत सधी हुई प्रतिक्रिया आ रही है. भारत के एक राजनयिक ने कहा कि श्रीलंका सरकार का ये आरोप बेबुनियाद है. उन्होंने कहा कि अगर आपातकाल को बढ़ाने के लिए शिविर की बात जानबूझकर कही गई है तो ये एक कमज़ोर दलील है.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार ऐसा माना जाता है कि 1970 और 80 के दशक में भारत के कई इलाक़ो में तमिल छापामारों को प्रशिक्षण दिया जाता था लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद लिट्टे पर प्रतिबंध लगा दिया गया था जो अब भी जारी है.












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