सलीम हर शाम जलाता है समाजसेवा की 'लौ'
मुजफ्फरनगर । एक टैक्सी ड्राइवर सलीम समाज सेवा की लौ जलाए हुए है। वह अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा समाज सेवा पर खर्च करता है। अपने द्वारा विभिन्न गली-मोहल्लों में स्थापित 75 लैम्पपोस्टों में वह हर शाम तेल डालने और उन्हें रोशन करने के लिए घर से निकल पड़ता है।
90 के दशक में हुए साम्प्रदायिक दंगों को देखकर उसने सामाजिक सद्भाव और समाज की सुरक्षा के लिए यह प्रण लिया था कि वह समाज को टूटने नहीं देगा, जिसमें वह आज भी कामयाब है।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद के कस्बा बुढ़ाना की नई बस्ती में रहने वाला सलीम टैक्सी चलाकर अपने परिवार का भरण पोषण करता है। बात सन् 1991-1992 की है, जब हर तरफ सम्प्रदायिक दंगों का माहौल था। उसी समय इस नौजवान ने समाज के लिए जीने-मरने की कसम खा ली।
बुढ़ाना कस्बा भी साम्प्रदायिक दंगों की चपेट में था। लोगों के बीच बढ़ते तनाव से दुखी होकर उसने समाज को एकजुट रखने व अफवाहों से बचाने के लिए अपना मिशन शुरू किया। उसने लोगों की सुरक्षा के लिए कस्बे में सामूहिक पहरा दिलाने की नींव डाली।
कस्बे की गलियों में रोशनी के लिए उसने खुद अपने खर्च से लैम्पपोस्ट स्थापित किए। उनमें वह रोज मिट्टी का तेल डालता है। इसके पीछे उसका मकसद है कि कोई भी असामाजिक तत्व अंधेरे का फायदा न उठा न ले।
इसी कार्य को आगे बढ़ाते हुए उसने 1993 में मिशन-उजाला शुरू किया और अपने खर्च से दस लैम्पपोस्ट लगवाए। आज लैम्पपोस्टों की संख्या 75 से भी अधिक है।
यह टैक्सी ड्राइवर अपनी गाड़ी का पहिया थामने के बाद हर शाम अपने लैम्पपोस्टों में अपनी जेब खर्च से तेल डालकर इन्हें रोशन करता है। भीषण गर्मी में राहगीरों को राहत देने के लिए उसने कस्बे के महावीर चौक पर पानी का टैंक भी स्थापित किया है। उसकी इच्छा है कि वह अपने लैम्पों की संख्या हजारों में कर दे और नागरिकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक गीजर लगवाए। वह गरीबों को अपनी गाड़ी में मुफ्त में ले जाता है।
सलीम कई बार जरूरतमंद लोगों को खून भी दे चुका है। वह बताता है कि अपनी कमाई का एक हिस्सा समाजसेवा के लिए रखता है। इससे उसके छह बच्चों के खर्च में कहीं कोई कमी नहीं होती। उसकी समाजसेवा आज मिसाल बनी हुई है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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