पहले विदेश दौरे के विवाद से बच निकले खनाल

काठमांडू, 11 फरवरी (आईएएनएस)। नेपाल के नए प्रधानमंत्री झलनाथ खनाल ने पहले विदेश दौरे को लेकर सम्भावित विवाद से बड़ी कुशलता के साथ किनारा करते हुए कहा है कि उनका पहला विदेश दौरा न तो भारत के लिए होगा न चीन के लिए।

खनाल (61) ने मीडिया को बताया कि वह अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑफ एशियन पॉलिटिकल पार्टीज (आईसीएपीपी) के निमंत्रण पर कम्बोडिया जाएंगे। आईसीएपीपी का सचिवालय सियोल में है।

आईसीएपीपी ने इस सप्ताह घोषणा की है कि उसने नोम पेन्ह में आयोजित होने वाले, 'नेपाल पर शांति चर्चा' में हिस्सा लेने हेतु नेपाल के प्रधानमंत्री को आमंत्रित करने के लिए तीन सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल नेपाल भेजा है।

आईसीएपीपी ने कहा है कि नेपाल की तीन प्रमुख पार्टियों के प्रमुखों ने कहा है कि फरवरी के अंतिम सप्ताह में आयोजित होने वाले सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए वे स्वतंत्र होंगे।

परम्परागत रूप से नेपाल का कोई नया प्रधानमंत्री पहले भारत का दौरा करता है, क्योंकि भारत, नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और प्रभावी पड़ोसी है।

2008 में जब माओवादी पहली बार सत्ता में आए थे, तो माओवादियों के प्रमुख पुष्प कमल दहाल प्रचंड, इस परम्परा को तोड़ते हुए पहले चीन की यात्रा पर चले गए थे। चीन, नेपाल का उत्तरी पड़ोसी है।

यद्यपि प्रचंड ने कहा था कि उनकी चीन यात्रा एक अनौपचारिक यात्रा थी, और वह मुख्यरूप से बीजिंग में 2008 के ओलम्पिक खेलों के समापन समारोह में हिस्सा लेने गए थे। लेकिन अब वह कहते हैं कि 2009 में उनकी सरकार इसलिए गिर गई थी, क्योंकि चीन की पहली यात्रा को लेकर भारत उनसे नाराज हो उठा था।

प्रचंड के बाद कम्युनिस्ट नेता माधव कुमार नेपाल प्रधानमंत्री बने थे। नेपाल, इस विवाद से बचते हुए अपनी पहली विदेश यात्रा के रूप में काहिरा निकल गए थे।

मिस्र की राजधानी काहिरा में हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन के 15वें शिखर सम्मेलन ने नेपाल को इस विवाद से बचने का अवसर उपलब्ध कराया था।

लेकिन यदि खनाल कम्बोडिया जाते हैं, तो भी इस मुद्दे पर विवाद तो पैदा होना ही है।

खनाल अभी तक न तो अपनी पूर्ण कैबिनेट की घोषणा कर पाए हैं, और न अपनी लघु कैबिनेट में शामिल तीन मंत्रियों को विभागों का बंटवारा ही कर पाए हैं। ऐसे में खनाल के पास निकट भविष्य में विदेशी दौरे पर किसी मौजमस्ती के लिए शायद ही समय मिल पाए।

माओवादियों ने सत्ता बंटवारे को लेकर पैदा हुए विवाद के कारण खनाल की सरकार में शामिल होने से इंकार कर दिया है और अब उन्होंने चेतावनी दी है कि वे अपना समर्थन वापस भी ले सकते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री खनाल किसी अन्य पार्टी को भी अपनी कैबिनेट में शामिल नहीं कर पाए हैं।

माओवादियों के साथ अवसरवादी गठजोड़ बनाने को लेकर जनता भी खनाल से बुरी तरह नाराज है और गुरुवार को संसद में उनके पहले भाषण को एक तरह से अनसुना कर दिया गया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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