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ब्‍लू फिल्‍म कांड ने दागदार कर दिया जेएनयू को

JNU
नई दिल्ली। देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरूर विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) में दुनिया भर से लोग पढ़ने के लिए आते हैं। देश के शीर्ष विश्‍वविद्यालयों में शामिल जेएनयू के हॉस्‍टल में हुए ब्‍लू फिल्‍म कांड ने इस विश्‍वविद्यालय पर ऐसा दाग लगाया है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा। इस धब्‍बे ने यहां के अन्‍य छात्र-छात्राओं, शिक्षकों व पूरे प्रशासन का सिर शर्म से झुका दिया है।

चार दिन पहले जेएनयू के हॉस्‍टल में ब्‍लू फिल्‍म बनाए जाने का प्रकरण प्रकाश में आया। देश भर के मीडिया ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए मामले को जबर्दस्‍त तूल दिया। ब्‍लू फिल्‍म से जुड़ी खबरें दुनिया के हर कोने में पहुंचीं। विश्‍वविद्यालय प्रशासन पहले तो कुछ नहीं बोला, फिर करीब दो दर्जन छात्र-छात्राओं से गहन पूछताछ के बाद इस मामले में दो छात्रों को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित कर दिया। यही नहीं प्रशासन पुलिसिया कार्रवाई करने की तैयारी में भी है।

बुधवार की शाम जेएनयू प्रशासन ने एक आदेश जारी करते हुए आरोपी छात्रों को नोटिस जारी किया और जांच के लिए बुलाया। निलंबित छात्रों में कोरियन भाषा के छात्र जनार्दन व कंप्‍यूटर साइंस के बलवीर शामिल हैं।

इन दोनों के पीछे कोई शातिर गिरोह है या ये छात्रों की अपनी बनाई हुई योजना, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन एमएमएस कांड के बाद जेएनयू में हुए इस ब्‍लू फिल्‍म कांड ने यहां के हॉस्‍टल प्रशासन को संदिग्‍धता के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है।

यूनिवर्सिटी में अपराध के प्रभाव:

इस पर लखनऊ के समाजशास्‍त्री ध्रुव कुमार त्रिपाठी का कहना है कि जब भी कोई अपराध किसी परिसर के अंदर होता है, तो उसका सबसे पहला प्रभाव प्‍लेसमेंट सेल पर पड़ता है। जेएनयू एक बड़ा विश्‍वविद्यालय है, शायद यहां कोई बड़ा प्रभाव नहीं दिखे, लेकिन अगर ऐसा कांड किसी राज्‍यस्‍तरीय विश्‍वविद्यालय में हुआ होता तो व्‍यापक स्‍तर पर फर्क दिखाई दे सकते थे।

छात्रों के इस प्रकार की हरकत के कारण अभिभावकों के मन में नकारात्‍मक छवि बन जाती है। खास तौर से वो अभिभावक जिनकी बेटियां हॉस्‍टलों में रहकर पढ़ाई कर रही हैं। प्रभाव पड़ता है उन विभागों की छवि पर जहां के छात्र अपराध में लिप्‍त होते हैं। इससे अगले सत्र में एडमीशन प्रभावित हो सकते हैं। डा. त्रिपाठी का कहना है कि इस कांड का सबसे बड़ा कारण को-हॉस्‍टल (जहां लड़का-लड़की दोनों रहते हैं) भी है। को-हॉस्‍टल की प्रथा देश के कुछ चुनिंदा विश्‍वविद्यालयों में ही है। सच पूछिए तो भारतीय संस्‍कृति के अंतर्गत को-हॉस्‍टल की प्रथा गलत है।

अंत में सबसे अहम बात यह कि पुलिस और विश्‍वविद्यालय प्रशासन को यह ढूंढ़ने की जरूरत है, कि कहीं कैंपस में कोई बड़ा सेक्‍स रैकेट तो नहीं चल रहा है।

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