छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने खारिज की बिनायक की जमानत याचिका (लीड-2)

न्यायमूर्ति टी. पी. शर्मा और न्यायमूर्ति आर. एल. झंवर की खंडपीठ ने खचाखच भरी अदालत में यह फैसला सुनाया।

इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त महाधिवक्ता व अभियोजन पक्ष के वकील किशोर भादुरी ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, "उच्च न्यायालय अपने 20 पृष्ठ के फैसले में बहुत हद तक मेरे तर्को से सहमत दिखा। मुझे खुशी है कि अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी।"

अदालत ने बुधवार को सेन की याचिका पर भादुरी का पक्ष सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। राज्य सरकार ने सेन के नक्सलियों के साथ सम्पर्क होने के आधार पर उनकी जमानत याचिका का विरोध किया था।

यूरोपीय संघ की दो महिला प्रतिनिधि इस मामले की सभी तीनों सुनवाई के दौरान उपस्थित रहीं। पहली सुनवाई 24 जनवरी को हुई थी जबकि दूसरी 25 जनवरी को और तीसरी आज यानी नौ फरवरी को हुई।

गत 24 जनवरी को प्रख्यात वकील राम जेठमलानी ने निचली अदालत के फैसले में खामियों का हवाला देकर सेन की जमानत दिए जाने की मांग की थी। उन्होंने सेन की सजा को 'बिना साक्ष्यों वाला मुकदमा' और 'राजनीतिक अभियोजन' करार दिया।

सेन के समर्थन में पक्ष रखने वाले अन्य वकील सुरेंद्र सिंह ने अपने तर्क में कहा था कि छत्तीसगढ़ पुलिस ने सेन का नक्सलियों के साथ सम्बंध स्थापित करने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करवाए हैं।

गत 24 दिसम्बर को रायपुर की निचली अदालत ने राष्ट्रद्रोह के आरोप में सेन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। सेन पर नक्सली विचारक नारायण सान्याल के साथ सम्पर्क रखने का आरोप है। उन्हें रायपुर की जेल में रखा गया है।

सेन की सजा की देश व दुनिया के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने आलोचना की थी। इन कार्यकर्ताओं का कहना है कि राज्य की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार सेन द्वारा सामाजिक अधिकार के मुद्दों को जोरशोर से उठाए जाने के कारण उन्हें अपना निशाना बना रही है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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