कत्‍ल की रात कितनी गहरी थी राजेश तलवार की नींद?

Aarushi Talwar
नोएडा। 16 मई 2008 की रात, आरुषि तलवार से पहले हाथापाई हुई, फिर उसके सिर पर गोल्‍फ स्टिक से हमला कर उसका कत्‍ल हुआ, इसी दौरान घर के नौकर हेमराज की भी हत्‍या हुई और फिर हेमराज के शव को कमरे से घसीटते हुए छत तक ले जाया गया, टेबल पर रखी शराब की बोतलों, फर्श, टेबल, आदि पर से खून के निशान साफ किए गए। उसके खिलौने संभाल कर रखे गए... इसके बावजूद बगल के कमरे में मौजूद राजेश तलवार और उनकी पत्‍नी नुपुर तलवार को भनक तक नहीं लगी?

तलवार की मानें तो उन्‍होंने एक आहट तो सुनी थी, लेकिन वो फिर सो गए। जरा सोचिए इस कांड को अंजाम देने में दो घंटे से ज्‍यादा समय लगा और दोनों कमरे से बाहर तक नहीं निकले। अगर हम माने कि तलवार दंपत्ति सो रहे थे, तो उस रात उनकी नींद कितनी गहरी थी, जो अपनी मासूम बेटी की चींख तक नहीं सुनाई दी?

सीबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक आरुषि, हेमराज की हत्‍या के दिन तलवार दंपत्ति उसके बगल के कमरे में मौजूद थे। यह बात उनके इंटरनेट आईपी एंड्रेस से भी सिद्ध हो चुकी है। इतने बड़े तथ्‍यों के बावजूद केंद्रीय जांच ब्‍यूरो कातिल को पकड़ने में नाकाम रहा। उसने अपनी क्‍लोजर रिपोर्ट में कह दिया कि मामले में पर्याप्‍त सबूत नहीं होने के कारण इसे बंद कर देना चाहिए, लेकिन साथ ही तलवार दंपत्ति पर शक की सुई टिका दी।

खास बात यह है कि तलवार दंपत्ति ने आरुषि के कत्‍ल के सबूत मिटाने की कोशिशें भी की। जाहिर है, यदि कोई बाहरी व्‍यक्ति कत्‍ल करने आएगा तो वो कत्‍ल के बाद, कमरे की सफाई नहीं करेगा, खिलौने संभाल कर नहीं रखेगा, हेमराज के शव को ऊपर नहीं पहुंचाएगा, गोल्‍फ स्टिक अपनी जगह पर जाकर नहीं रखेगा। खबर तो यह भी है कि उस स्टिक को हत्‍या के कुछ दिनों के बाद राजेश तलवार ने पॉलिश भी करवाया, ताकि खून के निशान मिट जाएं।

कोर्ट ने सीबीआई को एक बार फिर जांच आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने तलवार दंपत्ति को हत्‍या का आरोपी करार दे दिया है। आरुषि की हत्‍या से जुड़े सबूत नष्‍ट करने के प्रयास भी किए गए, लेकिन बचे कुचे सबूतों के आधार पर अब अगर सीबीआई अपनी जांच फिर से शुरू करती है, तो अब वो जब चाहे राजेश, नुपुर तलवार को गिरफ्तार कर सकती है।

विशेष अदालत ने दोनों के खिलाफ समन जारी करते हुए 28 फरवरी तक अदालत में पेश होने को कहा है। अब देखना यह है कि सीबीआई देश की सबसे बड़ी मर्डर मिस्‍ट्री को कैसे सुलझाती है। अंत में एक सवाल जरूर उठता है, कि अगर 17 मई 2008 को गिरफ्तार हुए राजेश तलवार को जमानत पर रिहा नहीं किया गया होता तो कई सबूत नष्‍ट होने से बच जाते। या अगर नुपुर तलवार को शक की बिला पर तभी हिरासत में ले लिया होता तो सबूत मिटाने के लिए रची गई साजिश कामयाब नहीं होती और इस मर्डर मिस्‍ट्री से पर्दा काफी पहले उठ गया होता। अब फिर से जांच करना सीबीआई के लिए और भी ज्‍यादा टेढ़ी खीर बन चुका है।

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