परेश बरुआ ने 10 फरवरी की शांति वार्ता खारिज की
उल्फा के प्रचार सचिव अरुणोदय दोहोतिया द्वारा ईमेल के जरिए भेजे गए एक बयान में कहा गया है, "सरकार के साथ शांति वार्ता हेतु महापरिषद द्वारा लिए गए निर्णय पर विचार नहीं किया जा सकता, क्योंकि महापरिषद अपने आप में असंवैधानिक थी।"
ज्ञात हो कि उल्फा नेतृत्व ने शनिवार को यहां पत्रकारों को बताया था कि पिछले सप्ताह आयोजित संगठन की महापरिषद ने केंद्र सरकार के साथ बिना शर्त शांति वार्ता का निर्णय लिया था और बैठक में स्वीकृत सभी प्रस्तावों से परेश बरुआ को अवगत करा दिया गया।
महापरिषद की बैठक की अध्यक्षता उल्फा के अध्यक्ष अरविंद राजखोवा ने की थी और उसमें संगठन के उपाध्यक्ष प्रदीप गोगोई, उप कमांडर-इन-चीफ राजू बरुआ, स्वयंभू विदेश सचिव सशा चौधरी, वित्त सचिव चित्रबन हजारिका, सांस्कृतिक सचिव प्रणति डेका तथा वयोवृद्ध राजनीतिक विचारक भीमकांता बरगोहैन ने हिस्सा लिया था।
उल्फा के सभी शीर्ष आठ नेता फिलहाल जमानत पर जेल से बाहर हैं, क्योंकि औपचारिक शांति वार्ता का मार्ग प्रशस्त करने के लिए सरकार ने सभी की रिहाई सुनिश्चित कराई थी।
सरकार और उल्फा नेतृत्व के बीच पहले दौर की शांति वार्ता नई दिल्ली में 10 फरवरी को प्रस्तावित है, जिसमें उल्फा की ओर से राजखोवा तथा सरकार की ओर से केंद्रीय गृह सचिव जी.के.पिल्लै के हिस्सा लेने की सम्भावना है।
आईएएनएस को प्राप्त हुए उल्फा के बयान में कहा गया है, "हमने अपने मुख्यालय (म्यांमार में कहीं) पर एक आपात बैठक बुलाई, जो रविवार को शुरू हुई और सोमवार तड़के समाप्त हो गई। हमने तय किया कि हमारे अध्यक्ष की अध्यक्षता में हुई महापरिषद की बैठक असंवैधानिक थी, क्योंकि वह बैठक हमारे शत्रु (सरकार) के दबाव में आयोजित की गई थी।"
बयान में कहा गया है, "हमने यह भी निर्णय लिया है कि प्रस्तावित शांति वार्ता असंवैधानिक है, और इसलिए हमने इस तरह की किसी भी संवाद प्रक्रिया को समर्थन न देने का निर्णय लिया है।"
बयान में कहा गया है कि आपात बैठक की अध्यक्षता परेश बरुआ ने की।
माना जा रहा है कि परेश बरुआ चीन-म्यांमार सीमा पर किसी जगह छुपा हुआ है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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