JPC के शोर में दफन हो गये देश के जरूरी मु्द्दे

नई दिल्ली। आज 13 दिसंबर है और आज ही के दिन 9 साल पहले देश की संसद पर आतंकी हमला हुआ था। वो हमला कुछ नापाक लोगों की देन था लेकिन एक हमला पिछले 9 दिसंबर 2010 से 13 दिसंबर 2010 तक हमारे संसद पर लागातार होता रहा है, उसका क्या? और उस हमले का नाम है जेपीसी शोर।

जो कि हमारे संसद के दोनों सदनों में फैला रहा। विपक्ष कहता रहा घोटालों की जेपीसी जांच कराओ और पक्ष उसकी अनसुनी करता रहा लेकिन दोनों की जिद में पीसता रहा आम आदमी। जिसकी कभी बम धमाकों में आवाज गुम जाती है तो कभी सरकारी फरमान उसकी कमर तोड़ देते है। आदर्श घोटाला, स्पैक्ट्रम घोटाला और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला पर जेपीसी मांग चिल्लाते चिल्लाते पूरा शीतकालीन सत्र समाप्त हो गया।

क्या घोटालों की जांच कराने पर पूरे देश की सभी जरूरी मु्द्दों का समाधान हमें मिल जाता, क्या जेपीसी जांच कराने पर भूखे को रोटी और युवाओं को नौकरी मिल जाती, नहीं, ऐसा कुछ नहीं होता। सरकार अपने तानाशाही रवैये के आगे झुक नहीं सकती थी और विपक्ष के पास इन मु्द्दों के आगे कुछ और था ही नहीं। इसलिए वो सिर्फ और सिर्फ शोर मचाती रह गई । दोनों ही शीतकालीन सत्र के खत्म होने का इंतजार करते रहे।

दिलचस्प ये है कि भले ही शीतकालीन सत्र का प्रश्नकाल गूंगा रहा लेकिन इसने एक नया रिकार्ड जरूर बना लिया। संसद में पहली बार ऐसा हुआ है जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर विपक्ष ने लगातार 22 दिन तक संसद की कार्यवाही पूरी तरह ठप कर दी। विपक्ष ने 64 करोड़ रुपये के बोफोर्स तोप सौदे के समय संसद में हुए 19 दिन के भारी हंगामे को भी पीछे छोड़ दिया।

बोफोर्स मामले में संसद की कार्यवाही में 45 दिन व्यवधान तो पड़ा लेकिन 19 बैठकों की कार्यवाही ही पूरी तरह ठप रही। संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल ने भी आज खुद कहा कि बोफोर्स के समय भी संसद इस प्रकार ठप नहीं हुई थी जैसा इस बार हुआ है।

हर्षद मेहता मामले में संसद की कार्यवाही करीब दो सप्ताह तक ठप रही थी जबकि तहलका रक्षा सौदे में संसद में 13 मार्च 2001 के बाद नौ दिन तक कोई कामकाज नहीं हुआ था और बजट सत्र के मध्यावधि अवकाश के बाद संसद एक बार फिर से एक सप्ताह तक ठप रही थी।

2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में अनियमितताओं के चलते सरकारी खजाने को हुए एक लाख 70 करोड़ रुपये के नुकसान को लेकर विपक्ष के हंगामे ने पूरे शीतकालीन सत्र पर पानी फेर दिया। संसद के इस सत्र को चलाने में लगभग डेढ़ अरब रुपये का खर्चा आया जबकि दोनों सदनों में 23 बैठकों के दौरान मुश्किल से दस घंटे बैठक चली, वह भी भारी हंगामे और नारेबाजी के बीच।

अब आप ही बताइये कि क्या संसद पर हमला नहीं है भले ही इसमें धमाकों की गूंज शामिल नहीं है, इसमें किसी का लहू नहीं बहा है लेकिन नुकसान तो हुआ है ना, यही नहीं कत्ल भी हुआ है वो भी जनता के विश्वास का।

घोटालों की जांच से तो दोषियों का निपटारा हो जायेगा लेकिन क्या पिछले 1 महीने चार दिन से ठप पड़ी संसद से जो हानि हुई है उसका कोई हिसाब करेगा। संसद को अपने झूठे अभिमान का रणक्षेत्र बनाने वाले हमारे राजनेता को आखिर ये अधिकार किसने दिया कि वो आम जनता के हक का सौदा करे? संसद का ना चलना क्या ये किसी संसदीय हमले से कम नहीं है?

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