भाजपा ने फिर उठाया अफ़ज़ल गुरु का सवाल

भाजपा ने फिर उठाया अफ़ज़ल गुरु का सवाल
भाजपा बार-बार अफ़ज़ल गुरु को फाँसी देने का मामला उठाती रही है. संसद पर हुए हमले की नौवीं बरसी पर विपक्ष ने एक बार फिर अफ़ज़ल गुरु को फाँसी देने के मामले में नोंकझोंक हुई है.

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने यह मामला उठाते हुए कहा कि देश जानना चाहता है कि सुप्रीम कोर्ट की पुष्टि के बाद भी क्यों अफ़ज़ल गुरु को फाँसी नहीं दी जा रही है. सरकार की ओर से गृहमंत्री पी चिदंबरम ने कहा वे इस मामले में कई बार स्पष्टीकरण दे चुके हैं.

उल्लेखनीय है कि 13 दिसंबर, 2001 को संसद पर पाँच आत्मघाती चरमपंथियों ने हमला कर दिया था. इन हमलों में इन पाँचों हमलावरों और सुरक्षाकर्मियों को मिलाकर कुल 14 लोगों की मौत हुई थी.

अफ़ज़ल गुरु पर इस हमले में शामिल लोगों की मदद का आरोप साबित हुआ और मौत की सज़ा सुनाई गई. इस समय उनकी याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित है जिसमें उन्होंने मौत की सज़ा माफ़ करने की अपील की है. भाजपा नेता सुषमा स्वराज ने सोमवार को कहा, "देश जानना चाहता है कि संसद पर हमले के लिए दोषी लोगों को सुप्रीम कोर्ट सज़ा सुना चुकी है और फिर वह इस सज़ा की पुष्टि भी कर चुकी है लेकिन सरकार इस पर चुप क्यों है?"

उनका कहना था कि सरकार को दोषी लोगों को जल्दी सज़ा देना चाहिए जिससे न केवल इस हमले के शिकार हुए लोगों के परिजनों को बल्कि पूरे देश को राहत मिले. लेकिन इसका जवाब देते हुए पी चिदंबरम ने कहा कि इस मामले में विपक्ष के साथ किसी बहस में शामिल नहीं होना चाहते क्योंकि आज वह दिन है जब नौ लोगों ने चरमपंथी हमले में अपनी जान गँवाई थी.

उन्होंने कहा कि वे मौत की सज़ा पाए उन लोगों के बारे में कई बार स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं जिन्होंने राष्ट्रपति के पास क्षमादान याचिका भेजी है. उनका कहना था कि एनडीए सरकार के दौरान राष्ट्रपति के पास 14 ऐसी याचिकाएँ भेजी गई थीं, जिनमें से किसी पर फ़ैसला नहीं हो सका था इसके बाद उनके पूर्ववर्ती गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने 14 और याचिकाएँ राष्ट्रपति के पास भेजी थीं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार उन्होंने कहा, "मेरे कार्यभार संभालने के बाद राष्ट्रपति के अनुरोध पर हर मामले पर पुनर्विचार हुआ और एक के बाद एक उन्हें वापस भेजा गया. राष्ट्रपति ने पाँच या छह मामलों में फैसला भी कर लिया है." चिदंबरम ने एनडीए के कार्यकाल में हुई प्रगति का हवाला देते हुए कहा, "मेरे ख़याल में रिकॉर्ड एकदम स्पष्ट है, (एनडीए के) छह वर्षों में शून्य, साढे़ चार साल में दो और इसके बाद के दो साल में पाँच या छह."

उनका कहना था कि इस बारे में सरकार को नियम क़ायदों का पालन करना होता है. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के पास ये मामले उसी क्रम में भेजे जाते हैं जिस क्रम आवेदन आए होते हैं और एक बार मामला राष्ट्रपति को भेजे जाने के बाद उनके फ़ैसले की प्रतीक्षा करनी होती है.

जिस समय संसद पर हमला किया गया था संसद का सत्र चल रहा था. भारत प्रशासित कश्मीर के निवासी अफ़ज़ल गुरु को संसद पर हमला करने वाले पाँच चरमपंथियों की मदद करने का दोषी पाया गया था और निचली अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी. वर्ष 2003 में उच्च न्यायालय ने इस सज़ा को बरकरार रखा और फिर वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसमें कोई रियायत देने से इनकार कर दिया था.

इस मामले के दो अन्य अभियुक्तों एसएआर गिलानी और अफशां गुरू को दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपों से बरी कर दिया था, इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया था. इनके अलावा दोषी पाए गए एक अन्य व्यक्ति शौक़त हुसैन को दस वर्ष के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद अफ़ज़ल गुरु ने राष्ट्रपति के पास क्षमादान याचिका भेजी थी, जिस पर अभी राष्ट्रपति ने कोई फ़ैसला नहीं किया है.

13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हुए हमले में चौदह लोगों की मौत हो गई थी जिनमें पाँचों हमलावर शामिल थे. इस हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में भारी खटास पैदा हो गई थी और नियंत्रण रेखा पर बड़ी संख्या में दोनों ओर से सेना तैनात कर दी गई थी. भारत का कहना रहा है कि इस हमले के पीछे पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठन लश्करे तैबा का हाथ था.

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