बुंदेलखंड में लाठियों से मनती है दीपावली

लखनऊ। कुछ लोग लाठियों को कंधे पर लिए हुए और कुछ उन्हें हवा में लहराते हुए अपने प्रतिद्वंद्वियों पर टूट पड़ते हैं। यह नजारा किसी लड़ाई के मैदान का नहीं, बल्कि बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा जिले में अनोखे ढंग से मनाई जाने वाली दीपावली का है। 'लट्ठमार दिवारी' की यह परंपरा यहां वर्षो से चली आ रही है।

जिले के त्रिवेणी, अमृतपुर, घाचा, बरोखा खुर्द आदि गांवों के लोग मैदानों में एकत्र होकर अलग-अलग दल बनाते हैं। एक समय में दोनों दल के अट्ठारह-अट्ठारह लठैत एक साथ मैदान में उतरते हैं और एक दूसरे पर ताबड़तोड़ लाठियां बरसाना शुरू कर देते हैं।

विगत कई सालों से 'लट्ठमार दिवारी' में भाग लेने वाले सुरेश रिसारिया ने आईएएनएस को बताया, "आप इसे एक नियमों से बंधा जोशीला खेल कह सकते हैं। दोनों दलों के सदस्यों की लाठियों की लंबाई और चौड़ाई बराबर होती है। लाठियों से ही प्रहार करना होता है और लाठियों से ही बचाव।"

मुख्य तौर पर बड़ी दिवाली के पूरे दिन खेले जाने वाले इस खेल (लट्ठमार दिवारी) में शामिल लठैत करीब दो महीने पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं। आप कह सकते हैं कि लाठियों की यह लड़ाई हमारे लिए दीवाली पर्व पर दीप जलाने और पटाखे छोड़ने की तरह उत्सव का एक हिस्सा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक 'लट्ठमार दिवारी' खेलते समय लोगों को हिंसक हुए बिना लाठियों के वार से बचना होता है।

घाचा गांव निवासी जय नारायण साहू कहते हैं कि अगर कोई नियमों का पालन नहीं करता तो उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। हर दो घंटे बाद दो नए दल मैदान में आकर पुराने दलों की जगह लेते हैं। इस 'लट्ठमार दिवारी' के लिए प्रशिक्षण दीपावली से कुछ महीने पहले शुरू हो जाता है।

बखोरा खुर्द गांव में हिस्सा लेने वाली दल के प्रशिक्षक आर.के. पाल कहते हैं कि इस खेल में सभी उम्र के लोग शामिल होते हैं। इसमें 10 से 50 साल तक की उम्र वाले लोग भाग ले सकते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि 'लट्ठमार दिवारी' सालों पुरानी परम्परा है। यह गांवों में मनोरंजन के एक साधन के रूप में शुरू की गई थी।

वहीं, 65 वर्षीय शिवहरे कहते हैं कि वह नहीं जानते कि 'लट्ठमार दिवारी' कब शुरू हुई, लेकिन उनके पुरखे विभिन्न अवसरों पर मनोरंजन के लिए लट्ठमार प्रतियोगिताएं आयोजित करते थे। बुजुर्गो ने उन्हें बताया इस तरह की प्रतियोगिता धीरे-धीरे दीपावली पर्व पर आयोजित की जाने लगी। इस तरह 'लट्ठमार दिवारी' एक परम्परा बन गई।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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