बाबर के शासनकाल में मस्जिद बनने का सबूत नहीं: न्यायमूर्ति अग्रवाल
लखनऊ। अयोध्या मामले में फैसला सुनाने वाली लखनऊ पीठ के तीन न्यायाधीशों में से एक न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने अपने आदेश में अपने साथी न्यायमूर्ति एस.यू.खान के विपरीत लिखा है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि विवादित स्थल पर मस्जिद मुगल सम्राट बाबर के शासनकाल में निर्मित किया गया था।
न्यायमूर्ति अग्रवाल ने कहा, "विवादित ढांचा मुसलमानों द्वारा हमेशा मस्जिद के रूप में माना गया। लेकिन यह साबित नहीं होता कि इसका निर्माण बाबर के शासनकाल में हुआ था।" न्यायमूर्ति अग्रवाल ने लिखा है कि हिंदू मान्यता और आस्था के अनुसार विवादित ढांचे के मध्य गुंबद का क्षेत्र भगवान राम का जन्मस्थान है।
अग्रवाल ने कहा है, "यह घोषित किया जाता है कि तीनों गुंबद में से केंद्रीय गुंबद के तहत आने वाला क्षेत्र अभियोगी (सूट-5) से संबंधित है और बचाव पक्ष द्वारा उसमें किसी तरह की बाधा या हस्तक्षेप नहीं उत्पन्न किया जाएगा।"
न्यायमूर्ति अग्रवाल के फैसले के कुछ प्रमुख कथ्य निम्न हैं :
* आंतरिक प्रकोष्ठ के अंदर का क्षेत्र दोनों समुदायों, यानी हिंदू (अभियोगी, सूट-5) मुस्लिम से संबंधित है, क्योंकि दशकों से इस परिसर का इस्तेमाल दोनों समुदायों द्वारा किया जा रहा था।
* विवादित ढांचे को मुसलमानों द्वारा हमेशा मस्जिद के रूप में माना गया और उसी के अनुरूप वहां नमाज अदा की गई। लेकिन यह साबित नहीं होता कि यह मस्जिद बाबर के शासनकाल में 1528 में निर्मित की गई थी।
* किसी अन्य सबूत के अभाव में यह कह पाना कठिन है कि यह विवादित ढांचा कब बना था और किसने बनवाया था। लेकिन यह स्पष्ट है कि इसका निर्माण मिशनरी जोसेफ टीफेंथलर के अवध इलाके में 1766-71 के बीच हुए दौरे के पूर्व हुआ था।
* विवादित ढांचे का निर्माण किसी गैर इस्लामिक ढांचे- एक हिंदू मंदिर को गिराने के बाद हुआ था।
* विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के नीचे मूर्तियों को 22-23 दिसंबर, 1949 की रात रखा गया था।
* बाहरी अहाते में राम चबूतरा, सीता रसोई एवं भंडार के तहत आने वाला क्षेत्र निर्मोही अखाड़े के नाम घोषित किया जाता है।
* बाहरी परिसर के अंदर का खुला क्षेत्र निर्मोही अखाड़ा और अभियोगी (सूट-5) के बीच बांटा जाएगा, क्योंकि इस क्षेत्र का इस्तेमाल आम तौर पर हिंदुओं द्वारा पूजा के लिए किया जाता रहा है।
* अयोध्या अधिनियम-1993 के तहत भारत सरकार द्वार अधिकृत भूमि संबंधित पक्षों को इस तरीके से उपलब्ध कराया जाएगा ताकि सभी तीनों पक्ष उस क्षेत्र का इस्तेमाल कर सके।












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