फैसले से मुसलमानों में निराशा

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने गुरुवार को फ़ैसला आने के बाद ही घोषणा कर दी वे सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती देंगे. हांलाकि बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी ने ये भी कहा था कि कोई प्रस्ताव आए तो दोनों पक्षों के बीच चर्चा भी हो सकती है.
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के संरक्षक एसक्यूआर इलियास ने अदालती फ़ैसले पर 'निराशा" जताते हुए कहा कि ये 'संतुलन बनाए रखने की कोशिश" लगती है. कुछ ऐसा ही मत जमिअत-उलेमा-ए-हिंद के अब्दुल हमीद नोमानी का भी है. नोमानी ने कहा कि ये मालिकाना हक़ के लिए लड़े गए पर निर्णय न होकर 'अरेंजमेंट या सेटलमेंट" जैसा लगता है.
इलियास ने कहा कि ये फ़ैसला मालिकाना हक़ के मूल मुद्दे को संबोधित नहीं करता. इलियास ने कहा, “अगर भूमि मंदिर की है तो उसके एक हिस्से को मस्जिद के लिए देने का क्या तर्क और अगर मस्जिद की है तो मंदिर को देने का क्या तर्क है. न्यायपालिका को मालिकाना हक़ पर साफ़-साफ़ फ़ैसला देना होगा."
'ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल' के मज़ूंर आलम ने कोर्ट के फ़ैसले को 'भ्रम" से भरपूर और विरोधाभासी बताते हुए कहा कि जजों ने तथ्य और साक्ष्यों के बजाय मान्यताओं का सहारा लिया है. दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी ने कहा है कि अभी सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े खुले हैं जो कि उनके शब्दों में 'क़ानूनी जंग का आख़िरी गढ़" है
सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील ज़फ़रयाब जिलानी सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने की जल्दी में नहीं हैं. गुरुवार को उन्होंने पत्रकारों को बताया, “वक़्फ़ बोर्ड ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक के बाद सुप्रीम कोर्ट जाएगा. हम जल्दी में नहीं हैं क्योंकि हमें अपील करने के लिए तीन महीने का वक़्त मिला है."
हैदराबाद में ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन यानी एमआईएम ने भी फ़ैसले पर निराशा का इज़हार करते हुए कहा है कि इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट अपील की जानी चाहिए.
एमआईएम के असदुद्दीन ओवेसी ने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फ़ैसला निराशाजनक है. ज़मीन के तीन हिस्से करना मुसलमानों को स्वीकार नहीं है. ज़ाहिर है इस मामले पर अब सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की जाएगी. "












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