सत्र 2010 शुरू: क्‍या आप रैगिंग से निपटने को तैयार हैं?

हाल ही में एसआरएम यूनिवर्सिटी गाजियाबाद के छात्र अभिषेक सहाय ने रैगिंग से तंग आकर आत्‍महत्‍या कर ली। यह घटना काफी देर से प्रकाश में आयी, क्‍योंकि प्रशासन रैगिंग के इस मामले को दबाना चाहता था। इसी प्रकार पिछले साल हरियाणा के एक मेडिकल कॉलेज में अमन कचरू की मौत का कारण भी रैगिंग बनी थी।

इस साल नया सत्र शुरू हो चुका है। रैगिंग नामक खतरनाक कीड़ा देश भर के कॉलेजों व संस्‍थानों में एक बार फिर पनपने को तैयार है। क्‍या आपके बच्‍चे उससे निपटने को तैयार हैं।

उम्‍मीद है, उसका सामना करने के लिए वो तैयार होंगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि स्‍कूल से निकलकर कॉलेज पहुचने वाले छात्र जिसन अभी ठीक तरह से दुनिया भी नहीं देखी होती है, उसे रैगिंग का शिकार बनाना चाहिए। और यदि उन्‍हें कोई शिकार बनाता है, तो उनके खिलाफ कड़ी सजा होनी चाहिए। खैर सजा के मापदंड तो कानून ने तय कर दिए हैं, लेकिन सजा तभी होगी, जब मामलों का खुलासा होगा। इसलिए हर छात्र को रैगिंग को जड़ से खत्‍म करने के लिए मामले को दबाने के बजाए उसके खिलाफ आवाज़ उठाने की जरूरत है।

रैगिंग विरोधी अभियान

मूटहूट फाइनेंस जैसी कई कंपनियां इस समय टेलीविजन विज्ञापन में रैगिंग के खिलाफ अभियान चला रही हैं। आप भी ऐसे अभियान शुरू करिए।

सही मायने में रैगिंग को खत्‍म करने में सभी कॉलेजों के सीनियर छात्रों के परिजन ही रोक सकते हैं। उन्‍हें अपने बच्‍चों को कठोरतापूर्वक समझाना चाहिए कि रैगिंग में उलझे तो उन्‍हें कोई बचाने नहीं आएगा। यही नहीं कॉलेज प्रशासन को भी खास तौर से सीनियर छात्रों को रैगिंग के खिलाफ कड़े कानूनों के प्रति आगाह करने की जरूरत है।

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