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अनूठा है देवघर का ज्योतिर्लिग

देवघर (झारखंड। झारखंड के देवघर जिला स्थित वैद्यनाथ धाम सभी द्वादश ज्योतिर्लिगों से भिन्न है। यही कारण है कि सावन में यहां ज्योतिर्लिग पर जलाभिषेक करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। वैद्यनाथधाम मंदिर के प्रांगण में ऐसे तो विभिन्न देवी-देवताओं के 22 मंदिर हैं परंतु मध्य में स्थित बना शिव का भव्य और विशाल मंदिर कब और किसने बनाया यह गंभीर शोध का विषय है। मंदिर के मध्य प्रांगण में शिव के भव्य 72 फुट ऊंचे मंदिर के अन्य 22 मंदिर हैं। मंदिर प्रांगण में एक घंटा, एक चंद्रकूप और मंदिर प्रवेश हेतु एक विशाल सिंह दरवाजा भी है।

यहां मनोरथ पूर्ण करने वाला कामना द्वादश ज्योतिर्लिग स्थापित है। यही नहीं इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है कि किसी भी द्वादश ज्योतिर्लिग से अलग यहां के मंदिर के शीर्ष पर 'त्रिशूल' नहीं बल्कि 'पंचशूल' है। अभी सावन के समाप्त होने में करीब एक सप्ताह का समय शेष है परंतु सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक यहां पहुंचने वाले शिवभक्तों की संख्या 33 लाख को पार कर चुकी है। इनमें 11 लाख से ज्यादा महिलाएं हैं।

पंचशूल के विषय में धर्म के जानकारों का अलग-अलग मत है। पंचशूल के विषय में मान्यता है कि यह त्रेता युग में रावण की लंका के बाहर सुरक्षा कवच के रूप में भी स्थापित था। उल्लेखनीय है कि धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक रावण जब शिवलिंग को कैलाश से लंका ले जा रहा था। भगवान विष्णु ने एक ग्वाले के वेश में रावण से इस शिवलिंग को लेकर यहां स्थपित किया था।

मंदिर के तीर्थ पुरोहित दुर्लभ मिश्रा के मुताबिक धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि रावण को पंचशूल के सुरक्षा कवच को भेदना आता था जबकि इस कवच को भेदना भगवान राम के भी वश में भी नहीं था। विभीषण द्वारा बतायी गई उक्ति के बाद ही राम और उनकी सेना लंका में प्रवेश कर सकी थी। उन्होंने कहा कि यही कारण है कि आज तक इस मंदिर को किसी भी प्राकृतिक आपदा का असर नहीं हुआ।

इधर, धर्म के जानकार पंडित सूर्यमणि परिहस्त का कहना है कि पंचशूल का अर्थ काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा ईष्र्या जैसे शरीर में पांच शूलों से मुक्त होने का प्रतीक है। जबकि पंडित कामेश्वर मिश्र ने इस पंचशूल को पंचतत्वों क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीरा से बने इस शरीर का द्योतक बताया।

मंदिर के पंडों के मुताबिक मुख्य मंदिर में स्वर्णकलश के ऊपर स्थापित पंचशूल सहित यहां के सभी 22 मंदिरों में स्थापित पंचशूलों को वर्ष में एक बार शिवरात्रि के दिन मंदिर से नीचे लाया जाता है तथा सभी को एक निश्चित स्थान पर रखकर विशेष पूजा-अर्चना कर पुन: वहीं स्थापित कर दिया जाता है।

ज्ञात हो कि पंचशूल को मंदिर से नीचे लाने और ऊपर स्थापित करने के लिए सिर्फ एक ही परिवार के लोगों को मान्यता मिली है। इसी खास परिवार के लोगों द्वारा यह कार्य किया जाता है।

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