आम से बनी शराब, बिस्किट और फेसपैक भी

आम के आम, गुठलियों के दाम
मुकुल श्रीवास्तव

बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए इलाहाबाद से

लखनऊ के केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान के वैज्ञानिक आम और उससे बने उत्पादों को ग्लोबल करने के प्रयास में जुटे हैं और इस टीम ने आम की वाइन, बिस्किट, फ़ेस पैक और तेल जैसी चीज़ें विकसित की हैं. इन उत्पादों को ख़ासी सराहना मिल रही है.

यूँ तो आम भारत का एक आम फल है लेकिन इसे ख़ास बनाती हैं इसकी विशेषताएं. इसीलिए कहा भी जाता है आम के आम और गुठलियों के भी दाम. भारत में एक तरफ़ जहां कच्चे आम की चटनी और अचार लोकप्रिय हैं, तो वहीं पका आम हमारे मुंह में पानी भर देता है.

खै़र, ये तो देसी बात हो गई लेकिन जब दुनिया बदल रही है तो आम को फलों में ख़ास बने रहने के लिए भी बदलना पड़ेगा. बदलाव की ये बयार आम को भी लग रही है और इस बदलाव में भूमिका निभाई है लखनऊ के वैज्ञानिकों की टीम ने.

इन वैज्ञानिकों की टीम की अगुवाई करने वाली डॉ. नीलिमा गर्ग का कहना है, "आम भारत के प्रमुख मौसमी फलों में से एक है लेकिन पर्याप्त शोध के अभाव में इसका ज़्यादातर इस्तेमाल सिर्फ़ एक फल के रूप में ही होता है. आम से बने उत्पादों को एक उद्योग के रूप में विकसित किया जाना अभी बाक़ी है."

उन्होंने आगे बताया, "जो उत्पाद बनते भी हैं वे सिर्फ़ आम के गूदे से ही बनते हैं जो कि आम के फ़ल का लगभग साठ प्रतिशत हिस्सा होता है. बाक़ी चालीस प्रतिशत हिस्से का इस्तेमाल व्यवस्थित तरीक़े से नहीं हो पाता जो एक बड़ी समस्या है."

एंजाइम और फ़ेस पैक भी

इन वैज्ञानिकों ने आम के छिलके से दो एंजाइम विकसित किए हैं जिनका इस्तेमाल फलों के रस को साफ़ करने में किया जाता है. इससे पहले इस एंजाइम को विदेशों से आयात करना पड़ता था और ये ख़ासे महंगे भी थे.

आम की गुठली से बना फ़ेस पैक कुदरती तौर पर बहुत गुणकारी है. आम के रेशे से बने बिस्किट का ज़ायका ही कुछ और है. लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चा है आम से बनी वाइन की.

डॉ नीलिमा का मानना है कि दुनिया के ज़्यादातर देश उन फलों की वाइन बनाते हैं जिनकी पैदावार उस देश में ज्यादा होती है लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता इसलिए फल की पैदावार के आर्थिक तौर पर लाभ के विकल्प कम रहते हैं.

फिलहाल इस्तेमाल नहीं

संस्थान के निदेशक डॉ. एच रविशंकर कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में आम की खेती का ढांचा पुराना है. इसको और अधिक वैज्ञानिक बनाने की ज़रूरत है. वाइन आबकारी नीति का हिस्सा है. इसलिए अभी इस वाइन का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं किया जा सकता."

फलों में शोध के लिए आम के चुनाव पर डॉ गर्ग कहती हैं, "आम बहुत आम है इस पर हम काम नहीं करेंगे तो और कौन करेगा. दूसरी बात, आम के बचे हुए हिस्सों को बेकार बताया जाता रहा है. वो बेकार इसलिए है क्योंकि हम उसका सही इस्तेमाल नहीं जानते. जरूरत सही इस्तेमाल जानने और करने की है."

आम के बाद वो आंवले पर भी काम कर रही हैं. आंवले के रस को निकालने के बाद उसके बचे हुए छिलके से उन्होंने आंवला चाय बनाई है जिसको पीने पर नींबू की चाय का अहसास होता है. वे मानती हैं कि अब निजी उद्यमियों को इन चीज़ों को जनता तक पहुंचाने के लिए आगे आना चाहिए.

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