नक्सली-पुलिस संघर्ष में पिस रहीं महिलाएं
लालगढ़ (पश्चिम बंगाल), 13 जुलाई (आईएएनएस)। नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच लड़ाई में हथियार थामने वाले लोगों में ज्यादातर पुरुष ही होते हैं लेकिन जनजातीय महिलाओं को इस संघर्ष की दोहरी मार झेलनी पड़ती है।
ज्यादातर पुरुष या तो गिरफ्तार हो जाते है या घर छोड़कर भाग जाते हैं। जनजातीय महिलाओं को परिवार का पेट पालने के लिए संघर्ष करना पड़ता है।
लालगढ़ को नक्सलियों से मुक्त कराने के लिए चलाए गए ऑपरेशन लालगढ़ के एक साल बाद जनजातीय महिलाएं अपने पतियों, बेटों और अन्य पुरुष सदस्यों की अनुपस्थिति में जीवन जी रही हैं।
पश्चिमी मिदनापुर जिले के मधुपुर गांव की एक महिला ने आईएएनएस को बताया, "मेरी तरह ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्हें नहीं पता कि वे क्या करें। मेरे पति जेल में हैं। मुझे तो यह भी नहीं पता कि उन्हें बाहर कैसे लाया जाएगा।"
उन्होंने कहा, "हम पुलिस द्वारा उठाए गए अपने बेटों के बारे में आंसू बहा सकते हैं।"
दरअसल, लालगढ़ के इस क्षेत्र में महिलाओं की दुर्दशा की कहानी करीब 19 महीने पहले शुरू हुई। पुलिस की कथित प्रताड़ना के कारण एक जनजातीय महिला ने अपनी बायीं आंख गंवा दी थी।
इसके बाद वर्ष 2008 में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्यजी को निशाना बनाकर नक्सलियों द्वारा किए गए एक बारूदी सुरंग विस्फोट के बाद छोटापीलिया गांव की सीतामोनी मुर्मु नक्सलियों को पकड़ने के पुलिस अभियान का शिकार बन गईं।
पुलिस की कथित ज्यादतियों के चलते जनजातीय लोगों में बहुत गुस्सा था, जिसके परिणामस्वरूप आठ नवंबर, 2008 को 'पीपुल्स कमेटी अगेंस्ट पुलिस एट्रोसिटीज' (पीसीएपीए) का गठन हुआ। इस संगठन को नक्सलियों का समर्थन प्राप्त था।
इसके बाद नक्सलियों ने हिंसा शुरू कर दी। उन्होंने जल्दी ही लालगढ़ पर नियंत्रण हासिल कर उसे स्वतंत्र इलाका घोषित कर दिया।
सरकार ने लालगढ़ में केंद्रीय अर्धसैनिक बल और पुलिस की टुकड़ियां भेजीं। छापेमारी की गई और गोलाबारी भी हुई। इसमें 38 पुलिसकर्मियों सहित 300 लोग मारे गए जबकि 700 लोग गिरफ्तार हुए।
कई जनजातीय युवा पुरुष घर छोड़कर भाग गए तो कुछ जंगलों में जाकर नक्सलियों के साथ मिल गए।
ऐसे में महिलाएं अकेली रह गईं, जो कानूनी लड़ाइयों में फंसी वे झारग्राम या मिदनापुर चली गईं।
संथाल जनजाति के विशेषज्ञ धीरेंद्रनाथ बास्की ने आईएनएस से कहा कि इससे अपने गांव से दूर जाकर असहज महसूस करने वाली महिलाओं को तनाव हुआ।
बास्की कहते हैं कि अन्य महिलाओं की अपेक्षा जनजातीय महिलाओं का उनके परिवार को चलाने में विशेष योगदान होता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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